कांग्रेस का चक्रव्यूह, सुखबीर की अग्रिपरीक्षा

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Monday, March 24, 2014-5:29 PM

: पंजाब में लोकसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा तैयार किए गए चक्रव्यूह को तोडऩा शिरोमणि अकाली दल के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के लिए एक चुनौती बन गया है। अतीत में तो सुखबीर ने अपनी माइक्रो मैनेजमैंट का चुनावों में लोहा मनवाया था पर इस बार कांग्रेस के चक्रव्यूह ने सुखबीर के लिए अवश्य कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

कांग्रेस नेतृत्व द्वारा बनाए गए चक्रव्यूह के तहत अमृतसर से पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, गुरदासपुर से पंजाब कांग्रेस कमेटी के प्रधान प्रताप बाजवा तथा आनंदपुर साहिब से पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी को चुनावी मैदान में उतारा गया है जबकि पार्टी ने भटिंडा में पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष मनप्रीत सिंह बादल को समर्थन दे दिया है जिनका मुकाबला सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर बादल से है। कांग्रेस अभी अपने कुछ अन्य दिग्गज नेताओं को भी चुनावी मैदान में उतारने पर विचार कर रही है।

अमृतसर तथा भटिंडा संसदीय सीटें अकाली दल के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्र बन गई हैं। अमृतसर में भाजपा के दिग्गज नेता अरुण जेतली अकाली दल के आग्रह पर भी चुनावी मैदान में उतरे थे, क्योंकि अकाली दल तथा भाजपा के मौजूदा सांसद नवजोत सिंह सिद्धू के आपसी रिश्ते बिगड़ गए थे। जेटली को टिकट मिलने के बाद न तो अकाली दल और न ही भाजपा ने यह सोचा था कि इस सीट पर सोनिया द्वारा कैप्टन अमरिंदर सिंह को चुनावी मैदान में उतार दिया जाएगा। अमृतसर संसदीय सीट पर अब सिख कांग्रेसी नेता तथा हिंदू भाजपा नेता के बीच मुकाबला है।

अमरिंदर की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं व नेताओं में राज्यभर में एक नया उत्साह पैदा हुआ है। वहीं दूसरी ओर अकाली दल के लिए अमृतसर में अमरिंदर ने नई चुनौती खड़ी कर दी है, क्योंकि अमृतसर सीट में पड़ते अधिकांश विधानसभा हलकों में कैप्टन समर्थक कांग्रेसी नेता ही आगे हैं। राज्य के अन्य स्थानों से भी कांग्रेसी नेताओं ने अमृतसर पहुंचने का निर्णय लिया है। कैप्टन संभवत: बुधवार को अमृतसर पहुंच रहे हैं जहां वह सभी कांग्रेसी नेताओं के साथ बैठक करेंगे।

अकाली दल के लिए जेटली को जिताना ‘वकार’ का प्रश्र बन गया है क्योंकि अगर जेतली को नुक्सान होता है तो अकाली दल की साख को धक्का लगेगा। जेटली भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। उनकी जीत मुख्य रूप से कैबिनेट मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया पर निर्भर करेगी। मजीठिया के लिए भी एक नई परेशानी खड़ी हो गई है, क्योंकि जहां उनके ऊपर अमृतसर सीट का उत्तरदायित्व रहेगा, वहीं दूसरी ओर उनका ध्यान अपनी बहन हरसिमरत कौर बादल की भटिंडा सीट की तरफ भी रहेगा। देखने वाली बात यह होगी कि मजीठिया अमृतसर में रहते हैं या भटिंडा में।

भटिंडा संसदीय सीट पर हरसिमरत बादल के मुकाबले कांग्रेस समर्थित मनप्रीत बादल चुनावी जंग में उतरे हुए हैं। 2012 के विधानसभा चुनावों में भटिंडा संसदीय सीट पर कांग्रेस व मनप्रीत की पार्टी को पड़ी कुल वोटों को अगर गिन लिया जाए तो वे अकाली दल की तुलना में 1.20 लाख वोटों अधिक बनती हैं। इसका अर्थ है कि अकाली दल को भटिंडा सीट जीतने के लिए 1.20 लाख वोटों का पुराना अंतर तोडऩे के लिए दुगनी वोटें प्राप्त करनी होंगी।

सुखबीर के लिए भटिंडा सीट महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र में राजग की सरकार बनने पर वह अपनी पत्नी को केंद्रीय मंत्री बनवाना चाहेंगे परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर सुखबीर व मजीठिया अमृतसर तथा भटिंडा में ही सिमट कर रह गए तो रा’य की अन्य संसदीय सीटों पर अकाली-भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में कौन प्रचार करेगा? पिछली बार तो सुखबीर व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल सभी सीटों पर पहुंचे थे परन्तु इस बार कांग्रेस नेतृत्व द्वारा बनाई रणनीति व चक्रव्यूह में फिलहाल अकाली दल उलझा हुआ प्रतीत हो रहा है। आनंदपुर साहिब में भी दिग्गज कांग्रेसी नेत्री अंहिका सोनी चुनावी मैदान में हैं। अगर एक दो और दिग्गज कांग्रेसी नेता चुनावी मैदान में आ गए तो इस चक्रव्यूह को भेदना शिअद के लिए चुनौती बन जाएगा।

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