करोड़ों की लागत वाला सिविल अस्पताल बना लोगों के लिए सफेद हाथी

Edited By ,Updated: 06 Jan, 2015 11:40 PM

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पंजाब सरकार द्वारा लोगों को सेहत सहूलियतें देने के जो वायदे किए जा रहे हैं उसकी नीचले स्तर पर जांच करने...

संगत मंडी(मनजीत): पंजाब सरकार द्वारा लोगों को सेहत सहूलियतें देने के जो वायदे किए जा रहे हैं उसकी नीचले स्तर पर जांच करने पर हकीकत कुछ ओर ही बयान करती है। जिसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि संगत मंडी में करोड़ों की लागत से इलाके के 32 गांवों के लोगों को सेहत सहूलियतें देने के लिए बना सिविल अस्पताल डाक्टरों की कमी कारण सफेद हाथी ही साबित हो रहा है। सरकार की बेरूखी का शिकार इस अस्पताल में डाक्टरों की बेहद कमी के चलते इलाके के लोगों को सेहत सहूलियतें देने के लिए दूर से अस्पतालों में जाने हेतु मजबूर होना पड़ रहा है। 

जानकारी के अनुसार 1968-69 में इस अस्पताल को सरकार ने 80 गांवों के लोगों के सेहत सहूलियतें देने के लिए प्राइमरी हैल्थ सैंटर के तौर पर 10 बिस्तरों के अस्पताल के तौर पर बनाया था। इसके बाद अकाली-भाजपा सरकार के समय इसको कम्युनिटी हैल्थ सैंटर के तौर पर इसका विस्तार कर इस पर अन्य करोड़ों रुपए खर्च कर उस समय के मंत्री बलराम जी दास टंडन ने 2 अगस्त 1997 को इसका 30 बिस्तरों के अस्पताल का उद्घाटन किया था। उस समय इस अस्पताल में डा. हरनेक सिंह भंगू और डा. दलजीत सिंह ढिल्लों जैसे काबिल डाक्टरों की बदौलत यहां मरीजों की भीड़ लगी रहती थी और इलाज हेतु अन्य प्रांतों से भी मरीज आते थे, परन्तु इससे बाद सरकारों की गलत नीतियों और अस्पताल के अमले की बेरूखी के कारण धीरे-धीरे यह अस्पताल इलाके के लोगों को सफे द हाथी साबित हो रहा है। 
 
इस समय अस्पताल में महिला रोगों की कोई भी डाक्टर न होने के कारण इलाके की महिलाओं को भारी मुश्किलें पेश आ रही हैं। 5 स्टाफ नर्सों की पोस्टों में भी यहां सिर्फ तीन स्टाफ नर्सों के सहारे ही यह अस्पताल चल रहा है। एमरजैंसी हलातों के मरीजों को भी यहां दर्जा चार के कर्मचारी सिर्फ सलाह देकर आगे भेज देते हैं। इस अस्पताल में जाकर देखने से इस तरह लगता है कि जैसे यहां सफाई ही न की गई हो। जगह-जगह लगे गंदगी के ढेर किस तरह बीमारियों को आमंत्रण दे रहे हैं। अस्पताल में बना जलघर पिछले कई वर्षों से मरीजों को साफ पानी देने से असमर्थ है, जिस कारण मरीज धरती नीचला पानी पी रहे हैं। 
 
इस अस्पताल में किसी समय दवाइयों की दुकान भी सरकारी अस्पताल में ही होती थीं, जिससे सरकार को आमदन भी थी और मरीजों को भी सस्ते मूल्य पर दवाइयां मिलती थीं जो सरकार की गलत नीतियों की भेंट चढ़कर बंद हो चुकी है, जबकि अस्पताल के बाहर दवाइयों की अन्य अनेक दुकानें सफलतापूर्वक चल रही हैं।
 
गौर है कि बादल परिवार ने अपने समझे जाते हलका भटिंडा के गांवों और शहरों में अगर सेहत सहूलियतों का यह हाल है तो पूरे पंजाब में सेहत सहूलियतों का क्या हाल होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इलाके के लोगों ने पंजाब सरकार से मांग की है कि इस अस्पताल की दयनीय हालत पर तरस करते हुए इसकी देखभाल की जाए। 
 
 
 

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