शास्त्र साक्षी हैं, इंसान ही नहीं भगवान भी डरते हैं अपनी पत्नी से!

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Monday, September 05, 2016-3:36 PM

घर के बाहर पुरुष जितना भी शक्तिशाली और ताकतवर हो, घर आते ही पत्नी के सामने उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। ये बात अकसर हंसी-ठिठोली में कही जाती है लेकिन शास्त्रों पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि ये बात शत प्रतिशत सही है। इंसान ही नहीं भगवान भी डरते हैं अपनी पत्नी से 

माना जाता है कि महिलाओं कि उत्पति भगवान शिव ने की थी। उन्होंने स्वयं अर्धनारीश्वर रूप लेकर स्‍त्री को उत्पन्न क‌िया। जब उन्होंने स्वयं उससे विवाह करके उसे अपनी अर्धांगिनी का दर्जा दिया तो उसकी शक्त‌ि का बोध हुआ। भगवान श‌िव ने माना कि पत‌ि पर सदा पत्नी का शासन होगा।
 
श्री हरि विष्णु के चित्र में देवी लक्ष्मी सदा उनके चरण दबाते देखी जाती हैं। ये भी माना जाता है की जहां उनके पति का पूजन श्रद्धा भाव से किया जाता है, वहां वे सदा वास करती हैं। एक समय वह अपने पति से रूठ कर बैकुंठ छोड़कर अपने मायके सागर में चली गई। उनके जाते ही देवलोक और बैकुंठ में अंधकार छा गया। सागर मंथन के दौरान देवी लक्ष्मी पुनः प्रकट हुई और श्री हरि विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
 
शास्त्रों के अनुसार, महिलाएं घर में गृहलक्ष्मी का रूप होती हैं। यदि घर से पत्नी नाराज होकर चली जाए या उस को दुख दिए जाए तो उस घर-परिवार में कभी खुशहाली नहीं आ सकती।    
 
भगवान ब्रह्मा ने जगत भलाई के लिए यज्ञ करना चाहा। जिसके लिए उन्हें शुभ मुहूर्त का इंतजार था। जब वो शुभ मुहूर्त आया तो उनकी पत्नी मां सरस्वती ने उन्हें इन्तजार करने को कहा। सनातन धर्म में कोई भी धार्मिक कार्य पत्नी के अभाव में पूर्ण नहीं हो सकता। अत: यज्ञ के कार्य में विलंब होने लगा। क्रोध में आ कर ब्रह्मा जी ने ग्वालिन गायत्री नाम की स्त्री से विवाह कर लिया और उन्हें अपने साथ यज्ञ में बैठाया ताकि समय रहते शुभ मुहूर्त में यज्ञ का कार्य पूर्ण हो सके। सरस्वती जी ने जब अपने स्थान पर दूसरेी स्त्री को बैठे देखा तो वे क्रोध से भर गई और ब्रह्मा जी को श्राप देते हुए कहा कि आपकी धरती पर कहीं भी और कभी भी पूजा नहीं होगी।  
 
 
शनि की दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्म पुराण के अनुसार बचपन से ही शनि देवता भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। इनकी पत्नी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थी। एक रात वह ऋतु-स्नान करके पुत्र प्राप्ति की इच्छा से इनके पास पहुंची पर ये श्रीकृष्ण के ध्यान में निमग्न थे। इन्हें बाह्य संसार की सुधि ही नहीं थी। पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई। उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसलिए उसने क्रुद्ध होकर शनिदेव को श्राप दे दिया कि आज से जिसे तुम देख लोगे, वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया। पत्नी को भी अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ किंतु शाप के प्रतिकार की शक्ति उसमें न थी। तभी से शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो।
 
शास्त्र साक्षी हैं जब-जब भी किसी पत्‍नी को क्रोध‌ आया तब-तब उसने व‌िनाशकारी रूप धरा है। इसका एक उदाहरण देवी काली भी हैं। पुरूष जितना भी शक्तिशाली हो जाए, उसकी सवारी तो देवी दुर्गा ही करती हैं।   

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