स्वाभिमान के बल पर व्यक्ति पा सकता है विजय

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Sunday, January 14, 2018-4:41 PM

कौरवों और पांडवों को बीच सुलह न होने पर जब युद्ध होना निश्चित हुआ, तो कौरव-पांडवों ने विभिन्न राजाओं को अपनी और से लड़ने का निमंत्रण भेजा। कुदंनपुर के राजा रुकम को भी दोनों और से निमंत्रण मिला। राजा रुकम ने सोचा कि न्यायपक्ष पांडवों का है, इसलिए उन्हीं का साथ दिया जाए, लेकिन बहन के विवाह में कृष्ण ने मेरा अपमान किया था और कृष्ण अर्जुन का साथ दे रहे हैं, इसलिए पांडवों का साथ देना भी उचित नहीं, तथापि अर्जुन का अपमान करने से अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण का भी अपमान करने से कृष्ण का भी अपमान होगा। वह अर्जुन से बोला, "मैं तुम्हारा साथ दे सकता हूं। लेकिन एक मेरी एक शर्त है कि तपम्हें मेरे चरण स्पर्श करके ये कहना होगा कि मैं बहुत भयभीत हूं और आपकी शरण में आया हूं। 

 


मेरी रक्षा करो। तभी मैं अपनी स्वीकृति दूंगा। अर्जुन ने उनसे कहा कि रुकम लगता है, तुम्हें खुद पर अंहकार हो गया है। तुम से यह किसने कहा कि मैं भयभीत हूं। मुझे स्वयं पर पूर्ण विश्वास हैं, मैं कायर नहीं हूं। यदि मुझे स्वंय पर विश्वास न होता, तो मैंने अकेले और वह भी नि: शस्त्र कृष्ण को ही क्यों चुना होता और अक्षौहिणी सेना को क्यों अस्वीकार किया होता? याद रखो, अर्जुन कृष्ण के अलावा किसी की भी शरण न जाएगा। यह दो टूक जवाब सुन रुकम को क्रोध आ गया, बोला, मैंने इतनी विशाल सेना लेकर तुम्हारा साथ देने की बात सोची थी, लेकिन मेरी शर्त अस्वीकार कर तुमने अपना अहित ही किया है। खैर, मैं अपनी शर्त दुर्योधन से पूरी कराकर उसी का साथ दूंगा। यह कहकर घमंडी रुकम वहां से चला गया। यह सर्वविदित है कि अंत में स्वाभिमानी अर्जुन को ही विजय मिली। 

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