गर्भ से नहीं राधारानी श्रीवृषभानु राज की तपस्या से इस तरह हुई थी प्रकट

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Thursday, September 08, 2016-10:14 AM
कल 9 सितंबर 2016 को श्रीराधाष्टमी है, इस दिन श्री कृष्ण की प्यारी राधारानी का प्राकट्य हुआ था। आप गोलोक में रास मण्डल के बाईं तरफ से आविर्भूत होकर श्रीकृष्ण की तरफ दौड़ीं थी इसलिए आपका नाम राधा हुआ। आपका प्राकट्य श्रीकृष्ण से ही हुआ है, कृष्णाभिन्न तनु होने के कारण आप श्रीकृष्ण की प्रियतमा हैं।
 
श्रीमती राधाजी के रोम छिद्रों से लाख-करोड़ गोपियां व श्रीकृष्ण के रोम छिद्र से लाख-करोड़ गोप और गऊंऐं प्रकट हुई थीं। बृहद्गौतमीय तन्त्र में श्रीमती राधा रानी का नाम स्पष्ट रूप में लिखा है। आपके आविर्भाव के सम्बन्ध में ऐसा सुना जाता है -
 
यमुना के तट पर श्रीवृषभानु राज की तपस्या से राधारानी यमुना में अपूर्व सौ दलों वाले पद्म में स्वयं प्रकटित हुई थीं, वृषभानु राज अति आश्चर्य रूपलावण्यमयी कन्या को प्राप्त कर परमानन्दित हुए। किन्तु जब उन्होंने देखा की कन्या की आंखें बन्द हैं, तो वे अति दुःखी हुए। हर समय कन्या के चक्षु बन्द देख वे अत्यन्त दुःखी मन से समय काटने लगे।
 
एक दिन उनके बन्धु नन्द महाराज जी अपनी पत्नी यशोदा देवी और शिशु गोपाल को लेकर वृषभानु राजा के पास आए तो वृषभानु राज नन्दमहाराज के सामने अपना दुःख निवेदन करने लगे। उसी समय एक अद्बुत लीला हुई।
 
शिशु गोपाल रेंगता-रेंगता राधारानी के पास चला गया। जैसे ही उसने आपको स्पर्श किया, आपने अपनी आंखें खोल दीं। श्रीमती राधारानी का संकल्प था कि आप आंखें खोलते ही पहले श्रीकृष्ण को देखेंगी इसलिए श्रीकृष्ण के आने के साथ ही राधा रानी ने नेत्र खोल दिए।
 
श्री चैतन्य गौड़िया मठ की ओर से
श्री भक्ति विचार विष्णु जी महाराज
bhakti.vichar.vishnu@gmail.com 
 

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