लीलावतार चिंतन से करें आत्मा को तृप्त

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Monday, September 19, 2016-1:37 PM

गीता में भगवान के अवतार के तीन कारण साधु पुरुषों की रक्षा, दुष्टों-अत्याचारियों का संहार तथा धर्म स्थापना बताए गए हैं जिसकी ज्ञान, बल तथा क्रियास्वरूपा त्रिशक्ति-जो प्रभु की इच्छा मात्र से सृष्टि, पालन तथा संहार कर सकती है, क्या उसकी समर्थ इच्छाशक्ति से दुष्टसंहारपूर्वक धर्मस्थापन नहीं हो सकता? वास्तव में भगवान को अपना सर्वस्व परम धन जानने तथा मानने वाले परमप्रेमी भक्तों का प्रेमाकर्षण ही पूर्ण आनंदमय परमात्मा के अवतार का मुख्य कारण है।


भगवान नित्य रसमय-आनंद स्वरूप होते हुए भी भक्तों के मनोगत भावों के अनुरूप अर्थात जो जिस स्वरूप में दर्शन चाहता है, उसकी इच्छापूर्ति निमित्त वैसा सगुण-साकार विग्रह धारण करके धराधाम में अवतरित होते हैं। जनसामान्य के जन्म लेने तथा भगवान के अवतार में यह अंतर है कि जीव माया के अधीन होकर कर्मवश जन्म लेते हैं, जबकि भगवान जीव का कल्याण करने के लिए करुणावश अपनी योगमाया को अधीन करके प्रकट होते हैं।


एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। जेल में जेलर, सिपाही, भंडारी तथा कैदी इत्यादि होते हैं। कैदियों को कर्मफल भोगने के लिए बंधन में पड़ कर रहना पड़ता है जबकि जेलर, सिपाही इत्यादि इच्छानुसार भीतर या बाहर आ-जा सकते हैं। इसी प्रकार ईश्वर अपने प्रेमी परिकरों तथा जीवनमुक्त महापुरुषों सहित धराधाम में आते-जाते रहते हैं या कभी-कभी दिव्य महापुरुषों को जगत्कल्याणार्थ भेजते रहते हैं।


भगवान का लीलावतार-विग्रह पंचतत्वों से उत्पन्न रक्त मांस आदि अपवित्र वस्तुओं से बना नहीं होता। ब्रह्मा मोह के प्रसंग में ब्रह्मा जी ने ‘स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि’ अर्थात प्रभो! आपका शरीर भावनामय है, पंचभूतों से बना नहीं है-कह कर प्रभु की स्तुति की है। पंचभूतात्मक शरीर सभी को एक जैसा ही दिखाई देता है परन्तु भगवान एक स्थान पर भी अलग-अलग स्वरूपों में दर्शन दे सकते हैं।


श्रीमद्भागवद् में कंस की सभा में श्री कृष्ण-बलराम जी का दर्शन सबको उनके हृदयों के भावानुरूप ही हुआ था। ऐसा वर्णन है। कंस की सभा के पहलवानों को वज्र सदृश सुगठित देह वाले, मनुष्यों को मानव श्रेष्ठ राजा, स्त्रियों को मूर्तमान् कामदेव, गोप-ग्वालों को स्नेही स्वजन दुष्टों को शासन करने वाले यमराज, माता-पिता को शिशु, भोजराज कंस को साक्षात् मृत्यु, अज्ञानियों को विराट ब्रह्म, योगियों को परमतत्व तथा वृष्णिवंशी यदुवंशियों को उनेक उद्धारक परमदेव के रूप में श्री कृष्ण तथा बलराम जी का दर्शन हुआ।


भगवद्अवतार में भगवान ऐश्वर्य, माधुर्य, सौशिल्य, सर्वशक्तिमत्ता, धर्म, ज्ञान-वैराग्य, यश तथा कोटिकन्दर्प-दर्प-दमनीय लावण्य इत्यादि की पूर्णता होते हुए भी वे विशेष प्रयोजन बिना, गुणों को प्रकट न करते हुए सामान्य मानव भी भांति ही रहते हैं परन्तु जैसे सूर्य छोटा तथा स्थान विशेष में स्थित दिखता हुआ भी सम्पूर्ण जगत् का अंधकार मिटा देता है, उसी प्रकार अवतार काल में प्रभु एकदेशीय प्रतीत होते हुए भी अपनी दिव्य अलौकिक शक्तियों द्वारा विश्वकल्याण तथा सबके हृदयों में दिव्यता का संचार कर देते हैं।


माचिस की तीली से अग्रि प्रकट किए बिना अग्रि-संबंधी कार्य नहीं हो सकते, वैसे ही निर्गुण-निराकार ब्रह्म के सगुण-साकार हुए बिना रसिक भक्तों के हृदय में आनंदरस संचारित करने वाली मधुरतम लीलाएं तथा सृष्टियादि कर्म भी नहीं हो सकते। र्निविकार, निराकार, निरंजन तथा कूटस्थ ब्रह्म भी भक्तों के प्रेम में बंध कर खिंचा चला आता है तथा सबका मुक्तिदाता प्रेमी भक्तों के हाथ का खिलौना बन जाता है। विदुरानी के प्रेम रसाभिसिक्त छिलके खाता है, कभी मइया यशोदा द्वारा ऊखल से बांधा जाता है कभी कौरव सभा में द्रौपदी की लाज बचाने हेतु वस्त्रावतार धारण करता है, कभी शबरी के जूठे बेर खाता है, कभी कर्माबाई की खिचड़ी खाता है। तभी तो जगत्स्रष्टा ब्रह्मा जी भी अपने प्रेमरज्जु से भगवान को बांधने वाले भक्तों की चरणधूलि की श्री कृष्ण से याचना करते हैं।


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