कृष्णावतार

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Sunday, September 25, 2016-1:29 PM

अर्जुन ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘कई दिनों की यात्रा के पश्चात जब हमारी नौका बड़े टापू के निकट पहुंची तो वहां सब ओर नौकाएं चल रही थीं। इस टापू के निकट पहुंच कर मैंने देवदत्त नामक अपना शंख बजाया। उसकी आवाज सुनते ही टापू के तट पर खड़े दानवों ने भी शंख बजाए। अनेक दानव कुछ ही देर में तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लेकर आगे बढ़े और अनेक प्रकार के बड़े-बड़े ढोल बजाने लगे। तब नवात कोच नामक असुरों से मेरा युद्ध हो गया और मैंने दानवों पर अपने गांडीव धनुष से बाण वर्षा आरंभ कर दी। छोटे-छोटे अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग करके हमने अनेक दानवों को यमलोक पहुंचा दिया। उधर देवराज इंद्र के नाविक नौका से कूद कर समुद्र तट पर जा पहुंचे और शस्त्रों से दानवों का वध करने लगे।’’

 

‘‘दानवों की अनेक नौकाओं ने हमारी नौका को चारों ओर से घेर लिया और बड़े-बड़े पत्थर फैंक कर इसे जल समाधि देने का प्रयास करने लगे। इसके साथ ही उन्होंने मुझ पर शस्त्रों से प्रहार भी आरंभ कर दिया। तब मैंने अपने अग्रि बाण का सहारा लिया। दानवों की एक नौका को मेरे अग्रि बाण से आग लग गई जिसकी लपटों ने अन्य नौकाओं को भी कुछ ही देर में अपनी लपेट में ले लिया। वायु बड़े वेग से चल रही थी। अनेक दानव नौकाओं में ही जल कर मर गए जबकि अन्यों ने समुद्र में छलांग लगा दी परंतु उनमें से भी 5-10 ही तैर कर किनारे तक पहुंच पाए। बाकी को मगरमच्छ और बड़ी-बड़ी समुद्री मछलियां निगल गईं।’’ 

 

‘‘ब्रह्मास्त्र का सहारा लेकर मैं चारों ओर अंधाधुंध बाण वर्षा कर रहा था परंतु मैं नाव में अकेला था और डूबने वालों की गणना कर पाना मेरे लिए असंभव था। देवराज इंद्र के दिए हुए कवच ने मेरे प्राणों को बचाए रखा। दानवों के फैंके हुए सभी शस्त्र मेरे शरीर से टकरा कर समुद्र में गिर पड़ते। दानवों ने जब यह देखा कि उनके शस्त्र मेरे शरीर पर कोई घाव नहीं कर रहे हैं तो उन्होंने मुझ पर पत्थरों की वर्षा आरंभ कर दी।’’
(क्रमश:)

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