कृष्णावतार

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Sunday, October 16, 2016-12:10 PM

अर्जुन ने आगे कहा, ‘‘मातुल ने मुझे बताया कि पलोमी और कालका नाम की दो दानव महिलाएं थीं। उन्होंने घोर तपस्या की और अंत में ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए तो उन महिलाओं ने वर मांगा कि हमारे पुत्रों को बिल्कुल भी कष्ट न हो। देवता, राक्षस या नाग कोई भी उन्हें मार न सके और उनके रहने के लिए एक बहुत ही सुंदर, मनोरम, प्रकाशपूर्ण तथा आकाश को छूता हुआ नगर हो। भोग विलास और ऐश्वर्य की सामग्री से यह नगर सदैव भरा रहे। रोग, शोक इस नगरी के निकट से भी न फटक सकें। ब्रह्मा जी तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गए।’’

 

अर्जुन ने ये सब बातें बताने के बाद कहा, ‘‘जब मातुल ने मुझे यह जानकारी दी तो मैंने उनसे पूछा कि क्या इस नगरी में अब कालका और पलोमी की संतानें ही निवास करती हैं?

 

इसके उत्तर में उसने बताया कि, ‘‘हां, रोग, शोक और हर प्रकार की चिंताओं से रहित अब उन दानव स्त्रियों के वंशज ही इस नगरी में निवास करते हैं। ये लोग सदा भोग विलास में लगे रहते हैं। ये देवताओं और मानवों को कष्ट देते रहते हैं। ब्रह्मा जी के वरदान के कारण कोई देवता इन पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। देवराज इंद्र उन्हें अपना बहुत भयंकर शत्रु समझते हैं। 

 

‘‘परंतु मानवों से तो उन्हें अजेय होने का वरदान दिया है ब्रह्मा जी ने?’’ जब मैंने मातुल से पूछा तो उसने मुझे बताया कि, ‘‘कालका और पलोमी ने कदाचित यह समझा कि जब देवता, असुर, दैत्य, दानव तथा नाग उन पर विजय प्राप्त नहीं कर सकेंगे तो बेचारे मानव किस गिनती में हैं  इसलिए उन्होंने मानवों से अजेय रहने का वरदान नहीं मांगा था।’’

 

‘‘तो फिर देवराज की यह सेवा भी लगे हाथों करते चलें। यदि उन्होंने भविष्य में शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करना स्वीकार कर लिया तो बहुत अच्छी बात है वरना मैं इन्हें तहस-नहस कर दूंगा। मुझे भी तो देवाधिदेव भगवान महादेव जी अजेय होने का वरदान दे चुके हैं।’’ मैंने मातुल से कहा।     
(क्रमश:)
 


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