‘हजारों साल नर्गिस अपनी बेनरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में सचिन सा दीदावर पैदा’

  • ‘हजारों साल नर्गिस अपनी बेनरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में सचिन सा दीदावर पैदा’
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Saturday, November 16, 2013-2:42 PM

नई दिल्ली: क्रिकेट को मजहब और उन्हें खुदा मानने वाले देश में एक अरब से अधिक क्रिकेटप्रेमियों की अपेक्षाओं का बोझ भी कभी सचिन तेंदुलकर को उनके लक्ष्य से विचलित नहीं कर सका और ऐसा उनका आभामंडल रहा कि कैरियर की आखिरी पारी तक भारत ही नहीं दुनिया की नजरें उनके बल्ले पर गड़ी रही।

मुंबई में आज अपना 200वां और आखिरी टेस्ट खेलने वाले तेंदुलकर महान खिलाडिय़ों की जमात से भी उपर उठ गए । क्रिकेट खुशकिस्मत रहा कि उसे तेंदुलकर जैसा खिलाड़ी मिला जिसने न सिर्फ समूची पीढ़ी को प्रेरित किया बल्कि उसके इर्द गिर्द क्रिकेट प्रशासकों ने करोड़ों कमाई करने वाला एक उद्योग स्थापित कर डाला।

चौबीस बरस तक सचिन ने जिस सहजता से अपेक्षाओं का बोझ ढोया, उससे सवाल उठने लगे थे कि वह इंसान हैं या कुछ और।  पूरे कैरियर में एक भी गलतबयानी नहीं, मैदान के भीतर या बाहर कोई विवाद नहीं, शर्मिंदगी का एक पल नहीं। तेंदुलकर एक संत से कम नहीं रहे जिन्होंने अपनी विनम्रता से युवा पीढी के क्रिकेटरों को सिखाया कि शोहरत और दबाव का सामना कैसे करते हैं।

सिर्फ 16 बरस की उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उतरे सचिन का सामना चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान से पहले ही कदम पर हुआ । वसीम अकरम और वकार युनूस के सामने उन्होंने जिस परिपक्वता का परिचय दिया, क्रिकेट पंडितों को इल्म हो गया कि एक महान खिलाड़ी पदार्पण कर चुका है।


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