‘ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं मिलना देश के साथ छलावा होगा’

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Wednesday, November 20, 2013-2:01 PM

नई दिल्ली: मेजर ध्यानचंद से पहले क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने से पैदा हुए विवाद के बीच इस महान हॉकी खिलाड़ी के बेटे अशोक कुमार ने आज कहा कि अगर वह खेल से जुड़े नहीं होते तो ध्यानचंद का नाम इस देश से मिट जाता। सरकार ने पिछले सप्ताह क्रिकेट को अलविदा कहने वाले चैम्पियन क्रिकेटर तेंदुलकर को भारत रत्न देने का ऐलान किया जो यह सम्मान पाने वाले पहले खिलाड़ी बने। इसके बाद से यह बहस छिड़ गई है कि किसी खिलाड़ी के लिए पहला भारत रत्न मेजर ध्यानचंद को मिलना चाहिए था।

ध्यानचंद के बेटे और 1975 विश्व कप विजेता टीम के सदस्य रहे अशोक कुमार ने कहा, ‘‘ध्यानचंद के नाम पर हम सिर्फ खेल दिवस मनाते हैं लेकिन नई पीढी को उनकी उपलब्धियों से अवगत कराने के लिये कोई पहल नहीं की गई। मुझे तो लगता है कि अगर मैं हॉकी नहीं खेलता होता तो इस देश से उनका नाम कभी का मिट गया होता।’’ उन्होंने कहा, ‘‘सभी आहत हैं। एक बार फिर ग्लैमर से भरे एक खेल ने जमीन से जुड़ी हॉकी को ठग लिया। ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं देना उनके साथ नहीं बल्कि पूरे देश के साथ छलावा है। तेंदुलकर को पुरस्कार मिलने से हमें कोई गिला नहीं लेकिन संयुक्त रूप से भी दिया जा सकता था।’’

उन्होंने ध्यानचंद के नाम पर कई पुरस्कार होने का तर्क देने वाले केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उन्हें इस तरह का बयान देने की जरुरत नहीं थी। अशोक ने कहा, ‘‘यह बहुत ओछा बयान है। उन्हें इस तरह से नहीं बोलना चाहिए था। ध्यानचंद ने अपने जीवन के सुनहरे साल हॉकी को दे दिए। उनके परिवार ने देश को 13 पदक (छह ओलंपिक, तीन विश्व कप और चार एशियाड) दिए। इससे अधिक क्या कर सकते थे। ये रिकार्ड नहीं बल्कि उपलब्धियां हैं लेकिन उस महान खिलाड़ी को देश में वह मुकाम नहीं मिला जिसके वह हकदार थे।’’

यह पूछने पर कि क्या इस सिलसिले में वह खेलमंत्री जितेंद्र सिंह से मिलेंगे चूंकि खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद के नाम की सिफारिश की थी, उन्होंने ना में जवाब दिया। उन्होंने कहा, ‘‘हमें जो करना था, हम कर चुके हैं। यह कोई चुनाव का टिकट तो है नहीं कि जिसके लिए लाबिंग की जाए। हम हक के तौर पर सम्मान लेना चाहते हैं और हमें तब तक उम्मीद है जब तक सरकार यह नहीं कहती कि ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं दिया जाएगा।’’

अशोक ने कहा कि ध्यानचंद ने ताउम्र जिन हालात का सामना किया, अगर वे उसके किस्से सुनाने लगे तो लोगों के आंसू निकल आएंगे। उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें आखिरी बार 1956 में पदमविभूषण मिला था। आखिरी समय उन्होंने मुफलिसी और इलाज के अभाव में गुजारा। सेना से बस 400 रुपए पेंशन मिलती थी और तब सरकार ने उनकी सुध नहीं ली।’’


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