वायु सेना को मिला पैने दांत वाला तेजस

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Friday, December 20, 2013-12:46 PM

बेंगलूर: करीब तीन दशक की अनथक यात्रा को पार करते हुए देश के अपने लड़ाकू विमान ने हथियार दागने की अपनी सभी क्षमताएं साबित करने का आज प्रमाण हासिल कर वायु सेना में शामिल होने की अंतिम सीढी पर कदम रख लिया। रक्षा मंत्री ए.के एंटनी ने देश में ही विकसित हल्के लड़ाकू विमान की अ प्रणालियों के परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे होने के बाद सर्विस दस्तावेज आज वायु सेना प्रमुख एन ए के ब्राउन को सौंप दिए और इस तरह 12 महीने बाद इसके वायु सेना के ध्वज तले आने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

 

जनवरी 2011 में इस विमान ने अपनी सुरक्षित उड़ान क्षमता साबित की थी और उसके बाद तेजस ने अपने हथियारों को दागने की क्षमता का प्रदर्शन शुरू कर दिया था। तेजस ने मिसाइलों 500 किलो के बमों समेत 62 विभिन्न प्रकार के ओं के तालमेल और उन्हें दागने की क्षमता साबित की। ऊंचाई वाले स्थानों से लेकर पोखरण की तपिश तक में तेजस की कड़ी की अग्नि परीक्षा ली गई जिसमें यह खरा उतरा। तेजस के मार्क-1 को वायु सेना में मिग-21 लडाकू विमानों का स्थान लेगा जिन्हें सेवा से बाहर शुरू करने का सिलसिला गत 12 दिसंबर से शुरू हो चुका है।

 

तेजस उन्नत मिग-21 बाइसन विमानों से कहीं बेहतर माना जा रहा है जबकि इसका अगला संस्करण मार्क-2 इंजन, राडार और हथियारों के मामले में मार्क-1 से कही आगे निकल जाएगा। तेजस कार्यक्र म से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि मार्क-1 के चार तेजस विमान इस साल तैयार हो जाएंगे जबकि अगले दो साल में आठ और इसके बाद प्रति वर्ष 16 तेजस विमान उत्पादन की क्षमता हासिल कर ली जाएगी। इन पहले चार विमानों को बेंगलूर के पास सुलूर एयरबेस पर रखा जाएगा ताकि किसी प्रकार के सुधार या संशोधन की जरूरत पडऩे पर हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड की मदद तुरंत ली जा सके जिसने यह विमान तैयार किया है।

 

तेजस को हवा से हवा में मार करने वाली आर-73 मिसाइलों, 23 एमएम गनों, रॉकेटों और आंखों की दृश्य सीमा से आगे देखने में सक्षम (बीवीआर) मिसाइलों से लैस किया जा रहा है। हवा में ईंधन भरने की क्षमता इसमें अगले साल तक शामिल कर ली जाएगी। तेजस के विकास के साथ ही भारत उन गिने चुने देशों में स्थान बना चुका है जो अपना खुद का फाइटर बना सके हैं। इनमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और दक्षिण कोरिया शमिल हैं।

 

कभी एलसीए परियोजना अगस्त 1983 में 560 करोड़ रुपये की मंजूरी से शुरू हुईं थी लेकिन अनुदान जारी करने में ही दस साल का समय लग गया और असली काम तभी आरंभ हो सका था। इसके एक दशक बाद तत्कालीन प्रधनमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के इस फाइटर को ‘तेजस’ दिया था। वायु सेना को इन विमानों की सत जरूरत है क्योंकि उसे बेहद पुराने पड़ चुके और हादसों के कारण ‘उडऩ ताबूत’ की कुयाति पा चुके मिग-21 विमानों से काम चलाना पड रहा है।

 

वायु सेना के पास 250 से अधिक मिग-21 विमान हैं। वायु सेना देश में बने 120 तेजस विमान लेने जा रही है जबकि इसका नौसैनिक संस्करण भी तैयार हो गया है। पिछले तीन दशक में तेजस परियोजना के विकास और उत्पादन पर करीब 17 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन विदेशों से विमान खरीदने का अंदाजा लगाएं तो इससे सरकारी राजस्व को बेहद फायदा होने जा रहा है। एक तेजस विमान की कीमत 200 करोड़ रुपये से कम होगी जबकि इस श्रेणी के लडाकू विमान यदि विदेशों से खरीदें तो भारत को दुगनी लागत खर्च करनी होगी। यानी भारत इस परियोजना से अगले एक दशक में करीब 40 हजार करोड रुपए की बचत कर लेगा।

 

तेजस हर मायने में दुनिया के किसी भी चौथी पीढ़ी के विमान से आगे है। स्टैल्थ विशेषताएं और सुपरसोनिक क्रूजरतार यदि इसमें जुड जाए तो यही पांचवी पीढी का विमान बन सकता है। परियोजना अधिकारियों के अनुसार तेजस अत्याधुनिक लाई बाई वायर तकनीकी से लैस है जिससे पूरा विमान बटन प्रणालियों से चलता है। उन्होंने बताया कि 2480 घंटे की उडानों में तेजस ने बिना किसी नकारात्मक घटना के यह सफर पूरा किया है।


तेजस की विशेषताएं
तेजस परियोजना से जुडे कुछ रोचक तथ्य इस प्रकार हैं
-तेजस का वजन करीब 9 टन
-हथियार ले जाने की क्षमता 12 टन
-अधिकतम ऊंचाई पर उड़ान 15 किलोमीटर
-स्पीड, गुरुत्वाकर्षण से सात गुना तक जाने की जी-7 फोर्स
-17 डिग्री का शार्प टर्न लेने की क्षमता
-आपरेशनल रेंज 400 किलोमीटर की परिधि में तेजस भर चुका है बेंगलूर से जामनगर तक की नान स्टाप उड़ान तेजस हैं 65 प्रतिशत पूरी तरह स्वदेशी इंजन और केनोपी शीट समेत 35 प्रतिशत विदेशी आरंभिक लागत 560 करोड] अभी तक कुल परियोजना लागत 17269 करोड़


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