पहली बार लैब में बनाए गए कृत्रिम फेफड़े

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Sunday, February 16, 2014-5:24 PM

न्यूयॉर्क: दुनिया भर में कई लोग फेफड़े की बीमारी से ग्रस्त हैं और जब उनकी बीमारी लाइलाज हो जाती है तो अंग प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है, लेकिन अंगदान करने वालों की कमी के कारण फेंफड़े की जरूरत पूरी नहीं हो पाती है और कई लोग असमय मौत के शिकार हो जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने इसी कमी को देखते हुए पहली बार प्रयोगशाला में कृत्रिम तरीके से फेफड़े को बनाया है। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास मेडिकल ब्रांच की शोधकर्ता जोन निकोलस की अगुआई में वैज्ञानिकों ने लैब में कृत्रिम फेफड़े का निर्माण किया है। निकोलस ने कहा, "अगर यह कृत्रिम फेफड़ा मानव शरीर में ठीक से काम कर गया तो फिर अंगदानकर्ताओं की कमी से लोगों को इतना जूझना नहीं पड़ेगा।"

वैज्ञानिकों ने अब तक श्वसन नली और यकृत को प्रयोगशाला में बनोन में सफलता हासिल की है। पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के मैकगोवनइंस्टीट्यूट फॉर रिजेनेरेटिव मेडिसिन के उप निदेशक डॉ. स्टीफन बेडीलाक ने इसे विज्ञान की अभूतपूर्व सफलता बताया है। टेक्सास में शोधकर्ताओं ने अपने शोध की शुरूआत सड़क हादसे में मारे गए दो बच्चों के क्षतिग्रस्त फेफड़ों से की। ये फेफड़े बुरी तरह क्षतिग्रस्त थे, लेकिन उनके कुछ उतक ठीक थे।

निकोलस ने बताया कि शोधकर्ताओं ने एक फेफड़े में मौजूद सभी तत्वों को हटा दिया और उसमें सिर्फ संयोजी उत्तक में मौजूद प्रोटीन कोलजन और लचीले प्रोटीन इस्लास्टिन को रहने दिया। इसके बाद उन्होंने दूसरे फेफड़े से कुछ उत्तकों को लेकर उसे पहले फेफड़े में डाला। इसके बाद उन्होंने इस पूरे ढांचे को एक खास तरह के तरल पदार्थ से भरे चैंबर में डाल दिया। उन्होंने बताया कि इस द्रव्य ने उतकों को बढऩे के लिए जरूरी पोषण दिया और चार सप्ताह बाद प्रयोगशाला में तैयार कृत्रिम फेफड़ा उनके सामने था।

उन्होंने एक बार फिर ऐसी प्रक्रिया दोहराई और दूसरा फेफड़ा लैब में तैयार किया। ये फेफड़े बिल्कुल असली फेफडों के समान हल्के गुलाबी मुलायम और कम घनत्व वाले हैं। निकोलस ने कहा कि इन फेफड़ों को पहले सुअरों में प्रत्यारोपित करके इनकी जांच की जाएगी और उसके
बाद इसे इंसानों पर आजमाया जाएगा।


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