पंजाब के हित में है ‘दिल्ली शिक्षा मॉडल’

Edited By ,Updated: 17 May, 2022 05:14 AM

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पंजाब में स्कूल शिक्षा बेहतर बनाने के लिए दिल्ली का शिक्षा मॉडल लागू करने की बात हो रही है। विद्वानों के अनुसार,  दिल्ली के शिक्षा मॉडल का दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित है कि

पंजाब में स्कूल शिक्षा बेहतर बनाने के लिए दिल्ली का शिक्षा मॉडल लागू करने की बात हो रही है। विद्वानों के अनुसार,  दिल्ली के शिक्षा मॉडल का दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना देश के सभी नागरिकों का अधिकार है। इस प्रकार दिल्ली में शिक्षा के एक ऐसे मॉडल का विकास किया गया है जो मुख्यत: 5 प्रमुख नुक्तों पर आधारित है। 

पहले स्थान पर स्कूल के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन का नुक्ता है। बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे स्कूल न केवल प्रशासन और सरकार की उदासीनता को दर्शाते हैं, बल्कि इनसे पढऩे एवं पढ़ाने को लेकर छात्रों तथा शिक्षकों के उत्साह में भी कमी आती है। इस समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने सर्वप्रथम स्मार्ट बोर्ड, स्टाफ रूम, ऑडिटोरियम, प्रयोगशाला और पुस्तकालय जैसी आधुनिक सुविधाएं प्रदान कीं, फिर अधिकांश विद्यालयों में आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित नई कक्षाओं का निर्माण किया गया। यह काम पंजाब में भी हुआ है। 

कहते हैं कि दिल्ली सरकार ने अपने बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में निवेश किया है। इसके अलावा सरकार ने प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों से स्कूलों की स्वच्छता, रख-रखाव और मुरम्मत आदि के बोझ को कम करने के लिए सभी स्कूलों में एक प्रबंधक की नियुक्ति की है। इस प्रकार के अधिकांश प्रबंधक सेवानिवृत्त सैनिक हैं। 
दूसरे स्थान पर शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों के क्षमता निर्माण को रखा गया है। शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था दिल्ली के शिक्षा मॉडल का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष है। इसके तहत शिक्षकों को उनके विकास के अवसर भी प्रदान किए गए। 

दिल्ली के सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों को उत्कृष्ट संस्थानों में कार्यरत विद्वानों से सीखने का अवसर प्रदान किया गया। वर्ष 2016 में प्रधानाध्यापक नेतृत्व विकास कार्यक्रम की शुरूआत की गई, जिसके तहत 10 प्रधानाध्यापकों का एक समूह प्रत्येक माह में एक बार विद्यालय में नेतृत्व संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करता है और संयुक्त स्तर पर उनसे निपटने के लिए उपायों की तलाश की जाती है। 

तीसरे, विद्यालय प्रशासन को जवाबदेह बनाना दिल्ली मॉडल का हिस्सा है। दिल्ली के सरकारी विद्यालय मुख्य रूप से अपनी अनुशासनहीनता के लिए काफी प्रसिद्ध थे। इस चुनौती से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने त्रि-स्तरीय निगरानी एवं निरीक्षण तंत्र स्थापित किया। इसके अलावा शिक्षा निदेशालय के जिला अधिकारियों ने अपने  जिलों के अंतर्गत आने वाले स्कूलों के प्रबंधन की निगरानी और ट्रैकिंग भी की। 

अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण स्तर पर स्कूल प्रबंधन समितियों का पुनर्गठन किया गया। मौजूदा समय में सभी कमेटियों का वार्षिक बजट अनुमानित लगभग 5.7 लाख रुपए या इससे अधिक है । साथ ही कमेटियों को यह छूट दी गई है कि वे इस धन को किसी भी सामग्री या गतिविधि पर खर्च कर सकते हैं। इसके बाद दिल्ली मॉडल में पाठ्यक्रम में सुधार पर ध्यान दिया गया है। 

वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में 9वीं कक्षा में असफलता दर 50 प्रतिशत से भी अधिक थी। आधारभूत कौशल के अभाव को सर्वसम्मति से इसका मुख्य कारण स्वीकार किया गया। नियमित शिक्षण गतिविधियों की शुरूआत की गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी बच्चे पढऩा, लिखना और बुनियादी गणित का कौशल सीखें। इसी प्रकार नर्सरी से कक्षा 8 तक के बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य हेतु ‘हैप्पीनैस पाठ्यक्रम’ की शुरूआत की गई । कक्षा 9 से 12 तक के बच्चों में समस्या-समाधान और विचार क्षमताओं को विकसित करने के लिए ‘उद्यमशीलता पाठ्यक्रम’ की शुरूआत की गई है। 

इसके बाद दिल्ली मॉडल में निजी विद्यालयों की फीस में स्थिरता पर ध्यान दिया गया है। उल्लेखनीय है कि उक्त चारों नुक्तों ने केवल दिल्ली के सरकारी विद्यालयों को प्रभावित किया, जबकि दिल्ली के निजी विद्यालयों में भी काफी अधिक संख्या में विद्यार्थी मौजूद हैं। पहले अक्सर यह देखा जाता था कि दिल्ली के सभी निजी स्कूल वाॢषक आधार पर अपनी फीस में 8.15 प्रतिशत की वृद्धि करते थे। दिल्ली सरकार ने सभी निजी विद्यालयों के लिए यह अनिवार्य किया कि वे फीस प्रस्ताव को लागू करने से पूर्व किसी भी एक अधिकृत चार्टर्ड अकाऊंटैंट से उसकी जांच कराएंगे। 

फिर दिल्ली के विद्यालयों में ड्रॉपआऊट दर को देखते हुए 2016 में ‘चुनौती’ योजना की शुरूआत की गई। इस पहल के तहत छात्रों को ङ्क्षहदी और अंग्रेजी पढऩे या लिखने तथा गणित के प्रश्न हल करने के आधार पर समूहों में विभाजित किया गया। उनकी सीखने की क्षमताओं के आधार पर उन्हें सरकारी स्कूलों में ‘विशेष कक्षाएं’ प्रदान की जाती हैं। यह योजना मूल रूप से नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी के मॉडल पर आधारित थी। 

याद रहे कि सच्ची शिक्षा वही है जो बच्चों के आध्यात्मिक, शारीरिक और बौद्धिक पहलुओं को उभारे और उन्हें प्रेरित करे। पंजाब की देश के शिक्षा मानचित्र पर स्थिति बेहतर है, अतीत में इसे बेहतर बनाने के प्रयास भी किए गए। पंजाब के बजट में शिक्षा से जुड़े संसाधनों में वृद्धि की जा सकती है। इसे और बेहतर बनाने की कोशिशों को सकारात्मकता से लेना होगा। कुल मिला कर दिल्ली शिक्षा मॉडल के ‘गुड प्वाइंट्स’ को पंजाब में अपनाना शिक्षा जगत को फायदा दे सकता है।-डा. वरिन्द्र भाटिया
 

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