सड़क से संसद तक विपक्ष के निशाने पर ज्ञानेश

Edited By Updated: 03 Oct, 2026 04:11 AM

from the streets to parliament gyanesh is the target of the opposition

विपक्ष के सवालों के घेरे में तो चुनाव आयोग महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के बाद से ही रहा है लेकिन 2 चुनाव आयुक्तों द्वारा 10 महीने में 14 बार आपत्तियों के मीडिया में खुलासे के बाद निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं।

विपक्ष के सवालों के घेरे में तो चुनाव आयोग महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के बाद से ही रहा है लेकिन 2 चुनाव आयुक्तों द्वारा 10 महीने में 14 बार आपत्तियों के मीडिया में खुलासे के बाद निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं। तीन दिन की मशक्कत के बाद ज्ञानेश को दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के साथ बैठक की तस्वीर और ‘आयोग में सब कुछ ठीक’ होने का दावा करने वाली प्रैस रिलीज जारी करने में तो सफलता मिल गई लेकिन ‘सुधारात्मक कदमों’ से सवालों और संदेहों की पुष्टि भी हो गई। 

यही कारण है कि कॉकारोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.) से ले कर विपक्ष तक ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे, एस.आई.आर. से पहले की मतदाता सूची बहाल करने और ई.वी.एम. की बजाय बैलेट पेपर से ही चुनाव करवाने की मांग को ले कर सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया है। सी.जे.पी. ने मुंबई के शिवाजी पार्क से देशव्यापी आंदोलन की शुरूआत की है तो ‘इंडिया’ गठबंधन के बैनर तले 20 विपक्षी दलों ने भी दो अक्तूबर से व्यापक आंदोलन शुरू कर दिया है। भाजपा की ‘बी टीम’ बताई जाती रही बसपा की सुप्रीमो मायावती ने भी ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग की है।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की बाबत एक अंग्रेजी अखबार द्वारा खुलासे से उत्साहित ‘इंडिया’ गठबंधन अपने आरोपों को ले कर राष्ट्रपति के पास भी जाएगा और संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता के विरुद्ध महाभियोग भी लाएगा। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून की वैधता के साथ ही चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई में भी इस बीच किसी फैसले की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन सत्तापक्ष और विपक्ष की निगाहें जन साधारण की प्रतिक्रियाओं पर ज्यादा रहेंगी। 
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के बाद से ही चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाते रहे हैं, जो पश्चिम बंगाल के बाद ‘सरकार चोरी’ में बदल गए। चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल भाजपा उन आरोपों को खारिज करते हुए कुछ विधानसभा चुनावों में विपक्ष की जीत को ले कर सवाल पूछते रहे लेकिन 2 चुनाव आयुक्तों द्वारा फॉर्म-6 समेत एस.आई.आर. प्रक्रिया तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर आपत्ति के खुलासे से विपक्ष के तेवर ज्यादा आक्रामक हो गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ने भी पिछली बार राहुल गांधी से आरोपों पर हलफनामा देने या माफी मांगने की मांग जैसी तल्खी नहीं दिखाई। भाजपा ही उनका बचाव कर रही है। भाजपा का तर्क है, क्योंकि चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठा कर विपक्ष उसकी सरकारों की वैधानिकता पर संदेह का माहौल बना रहा है, इसलिए उसे जवाब देना ही पड़ेगा। 

दरअसल चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून और खासकर ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के चलते चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पहले से ही संदेह और सवालों के घेरे में है। सर्वोच्च न्यायालय 2 बार टिप्पणी कर चुका है कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए। पिछली बार सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल किया-‘जब चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री शामिल है, तब क्या यह व्यवस्था वास्तव में ‘स्वतंत्र’ है या सिर्फ  स्वतंत्रता का दिखावा भर है? इस संरचना में कार्यपालिका का वर्चस्व स्पष्ट दिखाई पड़ता है।’ न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सवाल किया कि जब सी.बी.आई. निदेशक की नियुक्ति समिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं, तो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति में किसी स्वतंत्र सदस्य को जगह क्यों नहीं दी गई? 

चयन समिति में 2-1 से बहुमत के प्रावधान पर सवाल उठाते हुए पीठ ने टिप्पणी की-‘जब हर निर्णय 2-1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में ही जाने की संभावना है, तो फिर विपक्ष के नेता को समिति में रखने का औचित्य ही क्या है? यदि कैबिनेट मंत्री, प्रधानमंत्री के विरुद्ध नहीं जाएंगे तो विपक्ष के नेता की भूमिका मात्र ‘सजावटी’ बन कर रह जाती है।’

ध्यान रहे कि दशकों तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति बिना किसी कानून के की जाती रही। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून के अभाव में केंद्र सरकार की मनमर्जी रोकने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की गई थीं। उन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 2 मार्च, 2023 को संविधान पीठ ने फैसला दिया कि इस बाबत संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति देश के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की समिति की सिफारिश पर होगी। उसी साल 28 दिसम्बर को संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित कर कानून बना दिया, जिसमें 3 सदस्यीय चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश की बजाय प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को जगह दी गई थी।-राज कुमार सिंह 
 

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