क्या संसद महज डाकघर बनकर रह गई है

Edited By ,Updated: 23 Apr, 2022 05:59 AM

has parliament become a mere post office

भारतीय संसद के 2021 के मानसून सत्र में लोकसभा ने 18 से ज्यादा विधेयकों को औसतन 34 मिनट की चर्चा के साथ मंजूरी दे दी। पी.आर.एस. इंडिया के आंकड़े बताते हैं कि अनिवार्य रक्षा सेवा

भारतीय संसद के 2021 के मानसून सत्र में लोकसभा ने 18 से ज्यादा विधेयकों को औसतन 34 मिनट की चर्चा के साथ मंजूरी दे दी। पी.आर.एस. इंडिया के आंकड़े बताते हैं कि अनिवार्य रक्षा सेवा विधेयक (2021) को लोकसभा में सिर्फ 12 मिनट की बहस के बाद मंजूरी मिल गई, जबकि दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक ( 2021) पर महज पांच मिनट बहस हुई। 

एक भी विधेयक को संसदीय समिति के पास नहीं भेजा गया। सभी विधेयक ध्वनिमत से पास हुए। संसद की कार्य उत्पादकता का आलम यह है कि वह इस साल के हालिया सत्र में तो 129 फीसदी आंकी गई, पर बहस की संसदीय परम्परा इस दौरान तकरीबन समाप्त हो गई। क्या संसद महज डाकघर बनकर रह गई है? 

विधान पर बहस संसदीय लोकतंत्र की घोषित खासियत है। 2013 में अमरीका में सीनेटर टेड क्रूज को ओबामा केयर पर बोलने के लिए संसद में 21 घंटे और 19 मिनट मिले। जब संसदीय कार्रवाई में इस तरह की बहस के लिए अलग से समय दिया जाता है, तो आम सहमति बनाते हुए कानून की गुणवत्ता में सुधार का रास्ता साफ होता है। इस बीच, भारत में कृषि कानून निरसन विधेयक-2021 महज आठ मिनट (लोकसभा में तीन मिनट, राज्यसभा में पांच मिनट) में पारित हुआ। इस तरह सांसदों की संख्या कर्मचारियों की गिनती तक सीमित होकर रह गई। संविधान बनाने के लिए भारत की संविधान सभा की बहस दिसम्बर 1946 को शुरू होकर 166 दिन तक चली, जो जनवरी 1950 में जाकर समाप्त हुई। 

इस पूरी कवायद का मकसद था कि आदर्श रूप से संसदीय बहस की परम्परा को बहाल रखते हुए  उसे मजबूती दी जाए। सांसदों के लिए विवेक संवत् तरीके से मतदान की इजाजत हो ताकि विवेचना या विमर्श की अपेक्षित प्रक्रिया पुनर्जीवित हो। एक संसदीय लोकतंत्र को अपनी रचनात्मक दरकार के साथ सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। वेस्टमिंस्टर में, ब्रिटिश प्रधानमंत्री को हर बुधवार को हाऊस ऑफ कॉमन्स में सांसदों के सवालों के जवाब देने होते हैं। इसका इतना महत्व है कि कोविड-19  के दौरान भी प्रधानमंत्री को वर्चुअली सांसदों के सवालों के जवाब देने पड़े, जबकि इस अवधि में भारत में प्रश्नकाल को ही समाप्त कर दिया गया। 

जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक और तरीका संसदीय समितियां हैं। अमरीका में सीनेट और संसदीय समितियां कानूनों की जांच करती हैं, सरकारी नियुक्तियों की पुष्टि करती हैं, तफ्तीश करती हैं और सुनवाई करती हैं। 2013  में यू.के. में हाऊस ऑफ कॉमन्स ने एक सार्वजनिक सुनवाई तंत्र चलाया। इसके तहत जनता एक वैब पोर्टल के माध्यम से मसौदा कानून में टिप्पणियां कर सकती थी। इस प्रक्रिया में 1,400 से अधिक टिप्पणियों के साथ करीब एक हजार लोगों ने भाग लिया। 

इसके उलट सामान्य तौर पर अपने देश में लंबी अवधि की विकास योजनाएं संसदीय जांच के अधीन नहीं हैं और इन्हें सालाना खर्च की घोषणा के तहत मंजूरी मिल जाती है। जबकि इस तरह की समितियों को जब भी हस्तक्षेप का मौका है तो बेहतर नतीजे सामने आए हैं। मसलन, संयुक्त संसदीय समिति ने अक्तूबर 2013 में टैलीकाम लाइसैंस और इनके आबंटन पर और दिसम्बर 1993  में प्रतिभूतियों और बैकिंग लेन-देन में अनियमितताओं पर विचार किया और इसका प्रभावशाली नतीजा सामने आया। 

संसदीय लोकतंत्र की एक बड़ी खासियत सांसदों को स्वायत्त पहल की इजाजत देना भी है। यह पहल कई बार प्राइवेट मैम्बर बिल के तौर पर भी होती है। 2019 के बाद से यू.के. में सात निजी सदस्य विधेयक पास हुए हैं। यह संख्या कनाडा में 6 रही। बात करें भारत की तो 1952 से दोनों सदनों द्वारा केवल 14 निजी सदस्य विधेयक पारित किए गए हैं। दिलचस्प है कि इनमें भी 6 विधेयक तब पास हुए जब पंडित नेहरू सत्ता में थे। सांसद केवल व्हिप द्वारा हाईलाइट किए गए बटन को दबाने के लिए मोहताज हैं। भारत की 543 लोकसभा सीटों में से 250 पर ऐसे राजनेताओं का कब्जा है जो किसान होने का दावा करते हैं। सवाल है कि कृषि कानूनों पर आवाज उठाने का हक इनमें से कितने सांसदों को हासिल हुआ। 

क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कि लोकतंत्र के मंदिर में एक सांसद के लिए आत्मविवेक के आधार पर अपनी बात कहना और मतदान करना असंभव हो गया है। भारत में औसत संसद सदस्य 25 लाख से अधिक नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो बोत्सवाना, स्लोवेनिया, एस्टोनिया और भूटान जैसे देशों की आबादी से बड़ी संख्या है। 2026 तक, नए सीमांकन और आनुपातिक गणित के हिसाब से लोकसभा की 1000 से अधिक सीटें हो सकती हैं। जाहिर है कि बहस के लिए स्थान और समय दोनों कम पड़ेगा और ऐसे में संसदीय बहस की परम्परा और दरकार के लिए अलग से चिंता करने की जरूरत है। 

1956 में फिरोज गांधी ने संसदीय कार्रवाई के तहत प्रैस की आजादी को सुरक्षित करने के लिए प्राइवेट मैम्बर बिल पेश किया था। आगे चल कर इस बिल ने संसदीय कार्रवाई (संरक्षण और प्रकाशन) कानून (1956) की शक्ल ली। आदर्श रूप से संसद और उसके सदस्य एक जवाबदेह सरकार चलाने की कोशिश करें, इसके लिए अनुकूलताएं बहाल रहनी चाहिएं।-वरुण गांधी

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