ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने चीन की कुटिल चाल पर फेरा पानी

Edited By ,Updated: 05 Jul, 2022 06:08 AM

in the brics summit india turned water on china s devious move

24 जून को चीन ने ब्रिक्स सम्मेलन की अध्यक्षता की, जिसके इतर वैश्विक विकास पर उच्च स्तरीय संवाद का आयोजन भी हुआ। कोविड महामारी के बाद कोई भी नेता चीन में नहीं  जाना चाहता

24 जून को चीन ने ब्रिक्स सम्मेलन की अध्यक्षता की, जिसके इतर वैश्विक विकास पर उच्च स्तरीय संवाद का आयोजन भी हुआ। कोविड महामारी के बाद कोई भी नेता चीन में नहीं जाना चाहता था, इसलिए सम्मेलन वर्चुअल हुआ था। वैश्विक विकास पर होने वाले उच्च स्तरीय संवाद में चीन ने 13 गैर सदस्यीय देशों को आमंत्रित कर दिया। ब्रिक्स संगठन में भारत, रूस, ब्राजील, चीन, दक्षिण अफ्रीका स्थायी सदस्य देश हैं। 

बाकी 13 देशों में कंबोडिया, इथोपिया, अल्जीरिया, थाईलैंड, ईरान, कजाखस्तान, अर्जेंटीना, मिस्र, इंडोनेशिया, सेनेगल, उज्बेकिस्तान, फिजी और मलेशिया शामिल हुए, लेकिन चीन दरअसल इस बार के ब्रिक्स सम्मेलन में 14वें देश के तौर पर पाकिस्तान को शामिल करना चाहता था। ब्रिक्स सम्मेलन की वर्चुअल शुरूआत में ही चीनी राष्ट्राध्यक्ष शी जिनपिंग ने कहा कि कुछ देश सैन्य संगठन बना रहे हैं, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वह बिना नाम लिए अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत द्वारा बनाए गए क्वॉड संगठन के बारे में बोल रहे थे। जिनपिंग के इस भाषण से साफ होता है कि चीन अंदर से कितना डरा हुआ है, क्योंकि दुनिया के देश उसकी आक्रामकता के खिलाफ एकजुट होने लगे हैं। 

दरअसल चीन भारत को काऊंटर करने के लिए ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान को शामिल करना चाहता था। भारत ब्रिक्स समूह का स्थायी सदस्य देश है और ब्रिक्स संगठन के बैंक में गैर-विकसित और विकासशील देशों की प्रगति के लिए भारत ने पैसा भी लगा रखा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता असीम इफ्तिखार ने नाम लिए बगैर भारत पर आरोप लगाया कि उसने पाकिस्तान के शामिल होने पर आपत्ति जताई और उसे इस सम्मेलन में आने से रोक दिया। 

दरअसल किसी भी संगठन में पहले किसी देश को गैर-सदस्य के तौर पर उसके सम्मेलन में शामिल कराया जाता है, बाद में उसे स्थायी सदस्यता दी जाती है। लेकिन इस समूह के अहम सदस्य भारत के पास वीटो पावर भी है। ब्रिक्स संगठन उन विकासशील देशों को धन मुहैया कराते हैं जो अपने विकास के लिए छोटी-बड़ी परियोजनाएं चलाते हैं। ऐसे में किसी आतंकी देश को ब्रिक्स समूह में शामिल करने का चीन का मंसूबा अच्छी तरह से समझा जा सकता है। 

जानकारों की राय में चीन ब्रिक्स समूह का सर्वेसर्वा बनना चाहता है, इसलिए वह इसमें पाकिस्तान को शामिल कर भारत को पाकिस्तान के साथ उलझाए रखना चाहता है। अगर पाकिस्तान का इतिहास देखा जाए तो उसने दुनिया के हर बड़े वित्तीय संगठन से अपने विकास के नाम पर पैसा लिया और हजम कर गया। अपने मित्र देशों से भी पाकिस्तान ने पैसा लिया और कभी लौटा नहीं पाया। पाकिस्तान में सेना, राजनीति और प्रशासन तंत्र इतना भ्रष्ट हो गया है कि उसमें अब सुधार की कोई उम्मीद नहीं बची। ऐसे में पाकिस्तान ब्रिक्स संगठन में सिर्फ न चुका पाने वाला उधार लेता और संगठन पर एक बोझ बन जाता। ऐसे में पाकिस्तान को इस समूह में आमंत्रित न करने का फैसला बुद्धिमानी भरा है। 

वैसे भी पाकिस्तान आर्थिक विनाश की तरफ बढ़ चला है, वहां का राजनीतिक तंत्र भी चरमरा रहा है। पाकिस्तान एक प्रगतिशील देश नहीं और उसके पास दुनिया को देने के लिए कुछ भी नहीं है। ब्रिक्स समूह में ईरान पर भी आपत्ति दर्ज कराई जा सकती थी, लेकिन ईरान के पास दुनिया को देने के लिए कच्चा तेल है, उस पर लगे अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद उसकी हालत पाकिस्तान जैसी गंभीर नहीं। वहीं ब्रिक्स फोरम के बारे में आॢथक मामलों के जानकारों का कहना है कि इस वर्ष ब्रिक्स देशों की आर्थिक बढ़ौतरी 7.5 फीसदी होने वाली है। ऐसे में पाकिस्तान की एंट्री करवा कर ब्रिक्स संगठन का ब्रांड खराब होता और जो आर्थिक तरक्की होने वाली है, उस पर भी बट्टा लगता। 

पाकिस्तान का इतिहास रहा है कि वह जिस संगठन में बतौर सदस्य या गैर सदस्य गया, वहां पर उसने कश्मीर का राग अलापा है। इस बात से न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया त्रस्त हो चुकी है। एक बीमार देश को कोई भी अपने संगठन में शामिल नहीं करवाना चाहता। लेकिन सवाल चीन की मंशा का है, जिसने पाकिस्तान को ब्रिक्स देशों में एंट्री इसलिए दिलवाई, क्योंकि चीन की सी-पेक परियोजना में अरबों रुपया लगा है और उस परियोजना को वर्ष 2017 में पूरा हो जाना था, लेकिन वर्ष 2022 में भी उसका 75 फीसदी काम शुरू भी नहीं हुआ। सिर्फ 25 फीसदी काम आधा-अधूरा चल रहा है। चीन पाकिस्तान की सी-पेक परियोजना में ब्रिक्स का पैसा लगाना चाहता था, ताकि चीन पर इस समय कोविड महामारी के कारण जो आर्थिक दबाव है, उसे कम किया जा सके। चीन की सी-पेक परियोजना के पूरा न होने से चीन अपना सामान दुनिया के दूसरे हिस्सों में नहीं भेज पा रहा।

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