सिंधु जल संधि : हेग के फैसले से भारत-पाकिस्तान में नई कानूनी जंग

Edited By Updated: 02 Sep, 2026 03:05 AM

indus water treaty hague verdict sparks new legal battle between india and pak

सिंधु जल संधि पर हेग के फैसले से राजनीतिक और कानूनी लाभ उठाने की पाकिस्तान की उम्मीदों को भारत ने पूरी तरह नकार दिया है। नई दिल्ली ने मध्यस्थता न्यायालय को गैर-कानूनी ढंग से गठित संस्था बताते हुए उसके फैसले को मानने से इंकार कर दिया है। भारत ने...

सिंधु जल संधि पर हेग के फैसले से राजनीतिक और कानूनी लाभ उठाने की पाकिस्तान की उम्मीदों को भारत ने पूरी तरह नकार दिया है। नई दिल्ली ने मध्यस्थता न्यायालय को गैर-कानूनी ढंग से गठित संस्था बताते हुए उसके फैसले को मानने से इंकार कर दिया है। भारत ने स्पष्ट किया है कि इस फैसले को लागू करने का कोई सवाल नहीं और सिंधु जल संधि फिलहाल स्थगित है। हेग न्यायाधिकरण का कहना है कि भारत 1960 की संधि से बंधा है और वह एकतरफा तौर पर अपनी जिम्मेदारियां स्थगित नहीं कर सकता। इसके विपरीत, भारत उस न्यायाधिकरण के अधिकार-क्षेत्र को ही खारिज करता है जिसके तहत फैसला दिया गया। इसलिए विवाद केवल संधि की व्याख्या का नहीं, बल्कि न्यायाधिकरण के कानूनी अधिकार का है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर अत्यधिक निर्भर है। सिंधु का पानी उसकी करीब 80 प्रतिशत कृषि और 1.6 करोड़ हैक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सहारा देता है। भारत यदि पश्चिमी नदियों-चिनाब, झेलम और सिंधु, पर भंडारण और जलविद्युत ढांचे का विस्तार करता है, तो उसके पास जल प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता बढ़ सकती है। इससे पाकिस्तान की रणनीतिक चिंता बढ़ेगी।

भारत का कठोर रुख क्यों : भारत का रुख केवल रतले परियोजना तक सीमित नहीं है। 1960 में जब संधि हुई थी तब भारत-पाकिस्तान के संबंधों और क्षेत्र की भू-राजनीतिक परिस्थितियां आज से बिल्कुल अलग थीं। बाद के दशकों में दोनों देशों के संबंध लगातार बिगड़े हैं। सुरक्षा संकटों और पहलगाम आतंकी हमले के बाद यह टकराव और गहरा हुआ है। नई दिल्ली अब संधि के तहत अपने हिस्से में उपलब्ध जल के अधिक उपयोग और जलविद्युत परियोजनाओं के विकास की स्वतंत्रता चाहती है। हेग के फैसले को स्वीकार करने का अर्थ भारत के लिए उस न्यायाधिकरण के अधिकार को मान्यता देना होगा, जिसे वह गैर-कानूनी मानता है। इससे संधि के स्थगन संबंधी उसके रुख पर भी सवाल उठ सकते हैं। इसलिए नई दिल्ली के लिए फैसले को स्वीकार करना रणनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से कठिन है।

हेग का फैसला और रतले परियोजना : मध्यस्थता न्यायालय ने संधि को स्थगित करने के भारत के आधारों को खारिज करते हुए कहा है कि समझौता अभी भी प्रभावी है। उसने चिनाब पर रतले जलविद्युत परियोजना को लेकर अंतरिम उपाय लागू किए हैं। इसके तहत बांध की दीवार और विद्युत जल-प्रवेश ढांचे के कुछ हिस्सों पर निर्धारित स्तर से ऊपर कंक्रीट डालने के काम को सीमित किया गया है। यह रोक तटस्थ विशेषज्ञ के अंतिम फैसले और उसके बाद 90 दिनों तक प्रभावी रहने वाली है। 

भारत ने खींची कानूनी सीमा : भारत का कहना है कि न्यायाधिकरण का गठन सिंधु जल संधि में तय विवाद समाधान व्यवस्था के विपरीत हुआ है। भारत ने कार्रवाई में भाग लेने से भी इंकार किया है। नई दिल्ली का तर्क है कि न्यायाधिकरण उन विवादों पर अधिकार नहीं जता सकता, जिनका समाधान संधि में तय तंत्र के तहत होना चाहिए। उसके अनुसार, कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था भारत के संप्रभु निर्णयों को निर्धारित नहीं कर सकती और न ही यह तय कर सकती है कि वह अपनी जलविद्युत परियोजनाओं का विकास किस प्रकार करे। भारत ने मध्यस्थता न्यायालय और तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रियाओं के समानांतर चलने पर भी आपत्ति जताई है। 

पाकिस्तान की कानूनी बढ़त, व्यावहारिक दुविधा : पाकिस्तान के लिए फैसला इस दावे को मजबूत करता है कि भारत एकतरफा तौर पर संधि को स्थगित नहीं कर सकता। इससे इस्लामाबाद को भारतीय परियोजनाओं को चुनौती देने और अपने जल अधिकारों की रक्षा का दावा करने के लिए अतिरिक्त कानूनी आधार मिलता है। रतले परियोजना पर अंतरिम रोक पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन कानूनी जीत और उसके वास्तविक क्रियान्वयन में बड़ा अंतर है। न्यायाधिकरण भारत में निर्माण कार्य को भौतिक रूप से रोक नहीं सकता। यदि नई दिल्ली उसके अधिकार-क्षेत्र को अस्वीकार करती रहती है तो पाकिस्तान के पास भारत को फैसला मानने के लिए मजबूर करने के सीमित साधन ही होंगे। पाकिस्तान की कृषि, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जलविद्युत सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर हैं। इसलिए लंबे समय तक चलने वाला जल विवाद उसके लिए गंभीर आॢथक चुनौती बन सकता है।

असल लड़ाई अब शुरू : हेग का फैसला सिंधु जल विवाद का समाधान नहीं करता, उसने इसे और गहरा कर दिया है। इस्लामाबाद संधि को बाध्यकारी मानता है, जबकि नई दिल्ली इसे स्थगित मानती है। न्यायाधिकरण अपने अधिकार का दावा करता है, जबकि भारत उस अधिकार को ही नकारता है। रतले परियोजना तत्काल टकराव का केंद्र है लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है-क्या कोई अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण ऐसे देश पर दायित्व थोप सकता है, जिसने उसके अधिकार-क्षेत्र को ही स्वीकार नहीं किया है?
जो संधि कभी भारत-पाकिस्तान संबंधों में सहयोग का दुर्लभ उदाहरण थी, वही अब दोनों देशों के रणनीतिक टकराव का केंद्र बन गई है। हेग के फैसले ने खाई पाटने की बजाय यह साबित कर दिया है कि दोनों देशों के बीच यह खाई पहले से कहीं अधिक चौड़ी हो चुकी है।-के.एस. तोमर
 

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