नए कानून मंत्री के लिए न्यायिक सुधारों का रोड मैप

Edited By , Updated: 10 Jul, 2021 03:23 AM

road map of judicial reforms for new law minister

दिल्ली हाईकोर्ट की जज ने सरकार से कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 44 और सुप्रीम कोर्ट के 36 साल पुराने फैसले के बावजूद अभी तक समान नागरिक संहिता के बारे में कानून क्यों नहीं बना?

दिल्ली हाईकोर्ट की जज ने सरकार से कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 44 और सुप्रीम कोर्ट के 36 साल पुराने फैसले के बावजूद अभी तक समान नागरिक संहिता के बारे में कानून क्यों नहीं बना? सुप्रीम कोर्ट से निरस्त होने के बावजूद आई.टी. एक्ट की धारा 66ए भी अभी तक कानून की किताबों से खत्म नहीं हुई। ऐसे अनेक मामलों से नए कानून मंत्री किरण रिजिजू को जूझना पड़ेगा।

रिजिजू ने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की है, लेकिन उन्होंने कभी वकालत नहीं की। इसीलिए कानून के विद्वान रिजिजू न्यायिक व्यवस्था की उस सड़ांध का हिस्सा नहीं बन पाए, जिसको 6 साल पहले सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बैंच ने उजागर किया था। संविधान के जनक कहे जाने वाले डा. अंबेडकर ने जीवन के आखिरी पड़ाव में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। 

संविधान के कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में भगवान बुद्ध की करुणा के दर्शन का पूरा प्रभाव दिखता है। सौम्य लेकिन दृढ़ रिजिजू न्यायिक सुधारों के माध्यम से संविधान के कल्याणकारी राज्य के सपने को साकार करने का संकल्प पूरा कर सकें तो नए भारत का सपना साकार हो सकेगा। 

जनप्रतिनिधियों और नियुक्त किए गए जजों के बीच बढ़ती तकरार : आजादी के बाद से संसद, सरकार और नौकरशाही सभी क्षेत्रों में पारदर्शिता आने के साथ बड़े सुधार हुए। लेकिन अंग्रेजों के जमाने की न्यायिक व्यवस्था आजादी के 75 सालों बाद जस की तस है। कानून के क्षेत्र में भाजपा में सबसे बड़े महारथी माने जाने वाले स्व. अरुण जेतली ने कहा था कि जज लोग जनता से निर्वाचित नहीं होते हैं। इसलिए जनता द्वारा चुनी गई सरकार और संसद के सामने जजों को निरंकुश होने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उसके 6 साल बाद सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस रमन्ना ने कहा है कि हर 5 साल के चुनावों के बाद शासक बदलने मात्र से जनता को उत्पीडऩ से मुक्ति की गारंटी नहीं मिल सकती। 

कोरोना और लॉकडाऊन के दौरान सरकारी विफलता के लिए अनेक दिग्गज मंत्रियों की बलि दे दी गई। लेकिन घर बैठ कर काम कर रहे जजों से जवाबदेही और परफॉर्मैंस के बारे में कोई सवाल नहीं किए जा रहे। एन.जे.ए.सी. मामले में 6 साल पुराने फैसले के बावजूद जजों की नियुक्ति व्यवस्था में भी बदलाव नहीं हुआ। इसकी वजह से कुछेक खास परिवारों का पूरे न्यायिक तंत्र पर कब्जा हो गया। इसीलिए अभिजात्य अदालतों में आम जनता को समय पर सही न्याय नहीं मिल पाता। 

अदालतों में मुकद्दमों का बढ़ता ढेर और जजों की वैकेंसी : देश की विभिन्न अदालतों में लगभग 4.5 करोड़ मुकद्दमे पैंडिंग हैं। हर मुकद्दमे में औसतन दो पक्ष माने जाएं तो 9 करोड़ पक्षकार हो जाते हैं। हर पक्षकार के परिवार में औसतन 4 लोग माने जाएं तो भारत में लगभग 36 करोड़ लोग मुकद्दमेबाजी से पीड़ित हैं। देश में सरकार सबसे बड़ी मुकद्दमेबाज है। आम आदमी को तो नौकरी और दुकान छोड़कर अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जबकि अफसर लोग सरकारी खजाने के दम पर मुकद्दमेबाजी से लोगों को उत्पीड़ित करते हैं। सरकारी मुकद्दमों पर लगाम लगाने के लिए अनेक बार नियम बने, पर उनका कभी पालन ही नहीं हुआ। 

बेवजह की मुकद्दमेबाजी से आम जनता में गरीबी और तनाव बढऩे के साथ देश की जी.डी.पी. में गिरावट आती है। मुकद्दमों के अंबार से निपटने के लिए हमेशा अदालतों की सं या बढ़ाने की बात होती है। लेकिन देश में जितनी अदालतों का इन्फ्रास्ट्रक्चर है, अगर उसके अनुसार ही जजों की नियुक्ति हो जाए तो काफी राहत मिलेगी। सुप्रीमकोर्ट में 8 जज, हाईकोर्ट में 449 जज और निचली अदालतों में लगभग 5000 जजों की वैकेंसी है। सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति तो कॉलेजियम की अनुशंसा से केंद्र सरकार और राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। लेकिन निचली अदालतों में भर्ती तो संबंधित उच्च न्यायालयों द्वारा की जाती है। 

निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के बारे में कई सालों से सिर्फ बहस हो रही है पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई। जजों की नियुक्ति में विल ब के साथ पिछले कई सालों से विधि आयोग के गठन नहीं होने से कानून निर्माण का फ्रंट भी कमजोर पड़ा हुआ है। 

आर्थिक सुधारों की तर्ज पर न्यायिक व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधारों का रोड मैप : कोरोना और लॉकडाऊन से निपटने के लिए अफसरों ने आम लोगों पर धारा 144, धारा 188, महामारी और आपदा प्रबंधन कानून का बेधड़क इस्तेमाल किया। लेकिन उन्हीं कानूनों के तहत जब लोगों को मुआवजा देने की बारी आई तो आपदा और महामारी में तकनीकी फर्क बताया जाने लगा। 

विदेशी अदालतों के दम पर केयर्न कंपनी भारत सरकार की संपत्तियों की नीलामी करवा रही है। जबकि भारत में विदेशी कंपनियां जवाबदेही के बगैर खुली लूट मचाए हैं। सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम फैसलों और विधि आयोग की अनेक रिपोर्टों के अनुसार सनसैट क्लाज लागू करके नए और पुराने कानूनों की जीवन अवधि निर्धारित होनी चाहिए। हर 10 साल में नियम और कानूनों का रिव्यू हो कर उन्हें देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदला जाए तो समाज में सुख चैन और अर्थव्यवस्था में ईज ऑफ डूइंग बिजनैस बढ़ेगा। 

3 साल पहले ङ्क्षथक टैंक सी.ए.एस.सी. के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देकर अदालती कार्रवाई के सीधे प्रसारण की अनुमति दी थी। कोरोना काल में आपाधापी में ऑनलाइन सुनवाई शुरू हो गई, लेकिन इसका सही सिस्टम नहीं बना। देश की जिला अदालतों, हाई कोर्टों और सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के सीधे प्रसारण के लिए कानून बने तो सभी वर्गों के लोग लाभान्वित होंगे। 

नियम बनाने के बाद सरकार को इसके लिए तकनीकी और इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग भी देना होगा। कानूनी फ्रेमवर्क के तहत आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस का सही इस्तेमाल हो तो बेवजह की मुकद्दमेबाजी को शुरूआती दौर में ही खत्म किया जा सकेगा। 30 साल पहले शुरू हुए आॢथक सुधारों की तर्ज पर अब ब्रिटिश कालीन न्यायिक व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे। पूर्ण बहुमत वाली सरकार अब अदालती व्यवस्था में पारदॢशता लाने के साथ न्यायिक सुधारों की क्रांतिकारी शुरूआत करे तो मुकद्दमों के बोझ और अदालतों के चक्कर से समाज और देश को मुक्ति मिलेगी।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)

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