बेरोजगारी से लड़ने के लिए हर हाथ हुनर का हथियार जरूरी

Edited By ,Updated: 16 Jun, 2022 06:55 AM

to fight unemployment a weapon of skill is necessary

जब हम हुनर की बात करते हैं, तो हमारा मतलब निश्चित रूप से किसी को भी रोजगार लायक बनाकर उसकी आसानी और शालीनता के साथ आजीविका कमाने में मदद करना है। ‘नैशनल पॉलिसी ऑफ

जब हम हुनर की बात करते हैं, तो हमारा मतलब निश्चित रूप से किसी को भी रोजगार लायक बनाकर उसकी आसानी और शालीनता के साथ आजीविका कमाने में मदद करना है। ‘नैशनल पॉलिसी ऑफ स्किल डिवैल्पमैंट एंड एंटरप्रेन्योरशिप-2015’ के मुताबिक केंद्र सरकार का 2022 के अंत तक 40 करोड़ लोगों को हुनरमंद करने का लक्ष्य है। लेकिन अभी तक लगभग 4 करोड़ लोग विभिन्न कौशलों में प्रशिक्षित हो पाए हैं। 

स्किलिंग, री-स्किलिंग और अप-स्किङ्क्षलग के अलावा, रोजगार योग्य हुनर की कमी अभी भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है, इसलिए देश के सामने शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार बड़ी समस्या है। इसके लिए सरकार और सभी हितधारकों को आगे बढ़कर हमारे युवाओं (युवतियों और पुरुषों) को रोजगार योग्य हुनरमंद करने का एक बड़ा अवसर है, ताकि रोजगारदाताओं के लिए हुनरमंद मुलाजिमों की जरूरत पूरी की जा सके। 

रोजगारदाताओं की जरूरत और नौकरी चाहने वालों के हुनर के बीच मेल न होने से औद्योगिक गतिविधियों में बाधा आ रही है। हुनरमंद मुलाजिमों की मांग और  बाजार में उनकी उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। पूरा असंगठित क्षेत्र अर्ध-कुशल या अकुशल श्रमिकों पर निर्भर है। पूरी तरह से कुशल श्रमिक की कमी की वजह से बाजार में इनकी मांग हमेशा रहती है और उन्हें वेतन भी अच्छा मिलता है। विकासशील देशों में 15 करोड़ से अधिक स्किल्ड युवा हैं, लेकिन बेरोजगार हैं। दिसंबर 2021 में सैंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सी.एम.आई.ई.) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘युवाओं की बेरोजगारी दर बड़ों की तुलना में 4 गुणा तक अधिक है। लगभग 33 प्रतिशत प्रशिक्षित युवा बेरोजगार हैं क्योंकि उनकी रोजगार क्षमता बेहतर नहीं है’। 

बाजार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में कुशल लोग न होने के कई दुष्परिणाम हैं। विश्व स्तर पर मुकाबले के कारण, हम किसी भी परिस्थिति में ‘क्वालिटी’ से समझौता नहीं कर सकते। ऐसा करने से उत्पादन लागत बढ़ती है क्योंकि कारखानों में काम करने वाले अर्ध-कुशल श्रमिक उत्पादन में समय भी अधिक खपाते हैं और तैयार माल की क्वालिटी भी बेहतर नहीं होती। यहां तक कि उन्हें मशीनें चलाने के लिए सही ट्रेनिंग और मदद की भी जरूरत होती है। नौकरी चाहने वालों में जरूरी कौशल की कमी उद्योगों पर दोहरी मार है। कारोबार में किए गए निवेश पर कारोबारियों को सही रिटर्न नहीं मिलता, जिससे बाजार में उपलब्ध ‘वर्कफोर्स’ यानी कार्यबल के भविष्य में बेहतरी की संभावनाएं भी कम हो जाती हैं। 

विचार करने की जरूरत : हुनरमंद लोगों की कमी सीधी हमारी शिक्षा प्रणाली से जुड़ी है। स्कूली स्तर से ही बच्चों को किसी हुनर की ओर मोडऩे की जरूरत है, ताकि उच्च शिक्षा की ओर आगे न बढऩे वाले बच्चों को स्कूली शिक्षा के बाद रोजगार पाने में कोई मुश्किल न हो। यदि कोई बढ़ई, प्लंबर या इलैक्ट्रीशियन बनना चाहता है, तो उसे कम से कम विश्व स्तर का प्रमाणित हुनरमंद बनाना होगा। इसके लिए हरेक स्कूल में सैकेंडरी शिक्षा के साथ एक कौशल प्रशिक्षण केंद्र की जरूरत है। 

देश में भयंकर बेरोजगारी का बड़ा कारण रोजगार योग्य कुशल ग्रैजुएट्स देने में हमारी शिक्षा प्रणाली का पिछडऩा है। भारत की 65 प्रतिशत से अधिक कामकाजी आबादी 15 से 30 आयु वर्ग की है, जबकि देश में 90 प्रतिशत नौकरियां स्किल आधारित हैं। वहीं सिर्फ 6 प्रतिशत कार्यबल प्रशिक्षित है। स्किल प्रदान करने वालों और उद्योगों के बीच सही तालमेल के लिए स्कूली स्तर पर सभी कौशल पाठ्यक्रमों को रोजगार के साथ जोड़ा जाना चाहिए और यह सबसे बड़ी प्राथमिकता हो। 

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एन.ई.पी.-2020) का उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्ष 2035 तक 3.50 करोड़ नई सीटों के साथ व्यावसायिक शिक्षा का अनुपात 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य है। एन.ई.पी.-2020 व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा के साथ जोडऩे और सही सर्टीफिकेशन के साथ उन्हें रोजगार लायक बनाने पर जोर देती है। इसके लिए आई.आई.टी. और आई.आई.एम. के बराबर कई विषयों की शिक्षा और अनुसंधान विश्वविद्यालय (एम.ई.आर.यू.) स्थापित किए जाएंगे। एन.ई.पी.-2020 के मुताबिक, वर्ष 2050 तक कम से कम 50 प्रतिशत शिक्षार्थियों के पास स्कूल और उच्च शिक्षा के माध्यम से व्यावसायिक अनुभव भी होगा। लक्ष्य यही है कि प्रत्येक बच्चे को कम से कम एक व्यवसाय सीखना चाहिए। 

ध्यान रखना जरूरी है कि एन.ई. पी.-2020 व्यावसायिक और शैक्षणिक शिक्षा को अलग करके नहीं देखती। देश के सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा, जिसमें पहली से कक्षा 12वीं तक की व्यावसायिक शिक्षा शामिल है, की पहुंच सब तक सुनिश्चित की जानी चाहिए और इसके लिए बच्चों पर कुछ भी थोपने की बजाय उन्हें उनकी पसंद के विषय चुनने की अनुमति हो। असंगठित क्षेत्र के उद्योगों में गांवों और कस्बों के अकुशल श्रमिक अधिक हैं। यह सुनिश्चित करने की सख्त जरूरत है कि इन श्रमिकों को किसी भी कीमत पर रोजगार योग्य हुनरमंद बनाया जाए। यह उनके और उनके रोजगार देने वालों के लिए भी अच्छा होगा। हुनरमंद होने पर वे अधिक कमाएंगे और बेहतर जीवन व्यतीत करते हुए अपने रोजगारदाताओं के विकास में अहम योगदान देंगे। 

बात पते की 
-स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्रों को समय की मांग के मुताबिक जरूरी हुनर से लैस करना चाहिए जो उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाए। इकिताबी शिक्षा के साथ रोजगार योग्य एक प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी हो ताकि प्रत्येक विद्यार्थी के हाथ कोई हुनर हो। 
-पंजाब समेत कई राज्यों के युवा आई.ई.एल.टी.एस. बैंड के आधार पर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमरीका, यू.के. और अन्य देशों में जाते हैं, जो कि एक भाषा परीक्षण से अधिक नहीं है और यह उनकी रोजगार क्षमता को तय नहीं करता। 
-बाजार में कुशल कामगारों की पहचान करने के लिए राज्य सरकार के रोजगार कार्यालयों को ब्लॉक स्तर पर प्राइवेट सैक्टर के साथ सांझेदारी करनी चाहिए। ‘हरेक हाथ काम’ के लिए हुनरमंद करना जरूरी है।(लेखक ओरेन इंटरनैशनल के सह-संस्थापक और एम.डी., नैशनल स्किल डिवैल्पमैंट कॉर्पोरेशन के ट्रेनिंग पार्टनर हैं।)-दिनेश सूद 

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