Edited By jyoti choudhary,Updated: 15 May, 2026 05:59 PM

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार से निकलकर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी ने महंगाई, रु
बिजनेस डेस्कः पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार से निकलकर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी ने महंगाई, रुपए और शेयर बाजार को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी हुई हैं, जिससे आने वाले महीनों में आम लोगों की जेब पर और दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
रोजमर्रा की वस्तुएं हो सकती हैं महंगी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं और कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से निवेशक बाजार में सतर्क नजर आ रहे हैं।
निफ्टी 21,000 तक गिर सकता है
ब्रोकरेज फर्म एमके ग्लोबल के अनुसार, मौजूदा हालात में शेयर बाजार ने अभी पूरी तरह जोखिम को कीमतों में शामिल नहीं किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है, तो निफ्टी 21,000 के स्तर तक गिर सकता है। हालांकि उम्मीद जताई जा रही है कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते से कच्चे तेल की कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है।
इस बीच सरकार ने सोने और चांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है। इसका उद्देश्य चालू खाता घाटे पर दबाव कम करना बताया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ज्वेलरी सेक्टर प्रभावित हो सकता है और महंगाई पर भी असर पड़ सकता है।
बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम
तेल कंपनियों पर बढ़ते घाटे के चलते पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना भी जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा कीमतों पर कंपनियों को प्रति लीटर 17 से 18 रुपए तक का नुकसान हो रहा है। ऐसे में ईंधन की कीमतों में करीब 10 रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
महंगाई बढ़ने की स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक भी ब्याज दरों में इजाफा कर सकता है। इससे जहां रुपये को कुछ मजबूती मिल सकती है, वहीं कर्ज महंगे होने से आम लोगों और कारोबार पर अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट जल्द नहीं थमता, तो भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजारों पर दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।