Edited By Parveen Kumar,Updated: 14 May, 2026 09:30 PM

भारतीय स्टार्टअप जगत जिन उद्यमियों को अक्सर पीछे छोड़ देता है, उन्हें ढूँढ़ना मुश्किल नहीं है। वे छोटे शहरों और उपेक्षित जिलों में काम कर रहे हैं और ऐसी समस्याओं पर समाधान बना रहे हैं जो शुरुआती निवेशकों को आसानी से आकर्षित नहीं करतीं, जैसे प्रारंभिक...
नेशनल डेस्क : भारतीय स्टार्टअप जगत जिन उद्यमियों को अक्सर पीछे छोड़ देता है, उन्हें ढूँढ़ना मुश्किल नहीं है। वे छोटे शहरों और उपेक्षित जिलों में काम कर रहे हैं और ऐसी समस्याओं पर समाधान बना रहे हैं जो शुरुआती निवेशकों को आसानी से आकर्षित नहीं करतीं, जैसे प्रारंभिक शिक्षा, असिस्टिव टेक्नोलॉजी, पुनर्वास और दिव्यांगजन समावेशन। इनमें से कई पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं, जिनके पास ऐसे नेटवर्क नहीं हैं जो उनके लिए दरवाज़े खोल सकें, और न ही ऐसे नाम जो निवेशकों के बीच तुरंत भरोसा पैदा करें। नतीजतन, स्टार्टअप इकोसिस्टम ज़मीनी उद्यमियों के आसपास तो बढ़ा, लेकिन उन्हें अपने भीतर शामिल नहीं कर पाया।
इसी दूरी को कम करने के उद्देश्य से ‘सक्षम यात्रा’ जैसी पहल शुरू की गई। परोपकारी उद्यमी अजय गुप्ता द्वारा शुरू की गई इस पहल ने अप्रैल में नौ दिनों (4 से 12 अप्रैल) के दौरान अयोध्या, लखनऊ, आगरा और जयपुर जैसे चार शहरों का दौरा किया। इसकी संचालन इकाई ‘कामयाब ग्रांट्स’ ने शिक्षा और दिव्यांगजन समावेशन के क्षेत्र में काम कर रहे शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स को इक्विटी-फ्री फंडिंग उपलब्ध कराई। यह चयन सोच-समझकर किया गया था, क्योंकि दोनों ही क्षेत्रों में सामाजिक आवश्यकता बहुत अधिक है, लेकिन इन्हें वह शुरुआती संस्थागत निवेश शायद ही मिल पाता है जो किसी स्टार्टअप को प्रोटोटाइप से एक स्थायी उद्यम बनने तक पहुँचा सके।

इस पहल में आए आवेदन यह भी दिखाते हैं कि इन क्षेत्रों में वास्तव में कौन लोग काम कर रहे हैं। बताया जाता है कि देश के 25 से अधिक राज्यों से 300 से ज़्यादा स्टार्टअप्स ने आवेदन किया। इनमें आईआईटी और आईएसबी जैसे संस्थानों के छात्र भी थे, लेकिन बड़ी संख्या उन उद्यमियों की भी थी जो अपने परिवार में पहली बार व्यवसाय शुरू कर रहे थे। उनके लिए स्टार्टअप इकोसिस्टम अब भी एक नई दुनिया है, और इक्विटी-फ्री फंडिंग की कमी एक बड़ी संरचनात्मक बाधा बनी हुई है। 50 से अधिक स्टार्टअप्स दिव्यांगजनों के लिए समाधान विकसित कर रहे थे, जबकि 180 से ज़्यादा प्रारंभिक शिक्षा से जुड़ी चुनौतियों पर काम कर रहे थे। इसके अलावा, कामयाब ग्रांट्स के लिए चुने गए प्रत्येक चार संस्थापकों में से एक महिला थी।
ये आँकड़े इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उस सहज धारणा को चुनौती देते हैं कि भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में समावेशन की समस्या सिर्फ़ जागरूकता की कमी है। उद्यमी मौजूद हैं और निर्माण करने की इच्छा भी मौजूद है। जो चीज़ लगातार मौजूद नहीं है, वह है शुरुआती चरण में मिलने वाला वह ढाँचा और समर्थन जिसकी सबसे अधिक ज़रूरत होती है। इक्विटी-फ्री पूंजी उसी ढाँचे का एक अहम हिस्सा है। ऐसे संस्थापकों के लिए, जिनके पास गलती की गुंजाइश कम होती है और दूसरा मौका मिलने की कोई गारंटी नहीं होती, यह बेहद महत्त्वपूर्ण हो सकता है।
नौ दिनों की इस सक्षम यात्रा में केवल पिच सेशन ही शामिल नहीं थे। इसमें उत्तर प्रदेश के राज्य आयुक्त, दिव्यांगजन, से मुलाकात, लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी का दौरा, और जयपुर में भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति का भ्रमण भी शामिल था, जो ‘जयपुर फुट’ के लिए जानी जाती है। इसके अलावा वृंदावन स्थित अक्षय पात्र फाउंडेशन का दौरा भी किया गया, जो दुनिया के सबसे बड़े स्कूल भोजन कार्यक्रमों में से एक संचालित करती है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने स्टार्टअप इकोसिस्टम पर बातचीत करने की एक परिपक्व भाषा विकसित की है। ‘डिसरप्टिव इनोवेशन’ और ‘स्केल’ जैसे शब्द अब आम चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन जिस बात को समझने में अब भी समय लग रहा है, वह यह है कि इकोसिस्टम भी अक्सर उन्हीं जगहों और लोगों के आसपास केंद्रित हो जाते हैं जिन्हें वे पहले से पहचानते हैं। निवेश उसी दिशा में बहता है जहाँ पहले से पहचान और भरोसा मौजूद हो, और ध्यान भी उन्हीं सौदों पर जाता है जो पहले ही हो चुके हों। इसलिए यह समस्या इरादों की कमी से ज़्यादा संरचना की कमी की है, और संरचना को बदलने के लिए योजनाबद्ध प्रयासों की ज़रूरत है।
ऐसी पहलें, जो उद्यमियों के खुद आने का इंतजार करने के बजाय उनके पास पहुँचती हैं, इस संरचनात्मक समस्या का एक सक्षम जवाब हैं।