ग्रहण में भी बंद नहीं होता ये मंदिर, दर्शन देने आती हैं मां

Edited By Jyoti,Updated: 04 May, 2018 11:32 AM

kalakaji temple in delhi

भारत की राजधानी दिल्ली के कमल मंदिर के समीप सूर्यकूट पर्वत पर कालिका मंदिर स्थित है। मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में किया गया था। यह देवी कालका यानि देवी काली को समर्पित है। इसे प्राचीन सिद्धपीठ कहा जाता है।

भारत की राजधानी दिल्ली के कमल मंदिर के समीप सूर्यकूट पर्वत पर कालिका मंदिर स्थित है। मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में किया गया था। यह देवी कालका यानि देवी काली को समर्पित है। इसे प्राचीन सिद्धपीठ कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी जगह पर आद्यशक्ति माता भगवती ने 'महाकाली' के रूप में प्रकट होकर असुरों का संहार किया था। जिसके बाद से यह मंदिर मनोकामना सिद्धपीठ के रूप से विख्यात हुआ। 


पौराणिक कथा
लोक मत के अनुसार महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ इस जगह (सूर्यकूट पर्वत) पर देवी भगवती की पूजा-अर्चना की थी। कुछ समय बाद इसी स्थान पर बाबा बालक नाथ ने तपस्या कर माता भगवती के दर्शन किए थे। 


मंदिर के स्थानीय लोगों के अनुसार, असुरों द्वारा सताए जाने पर देवताओं ने यहीं पर देवी (शक्ति) की अराधना की थी। देवताओं के वरदान मांगने पर मां पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। जिन्होंने अनेक असुरों का संहार किया था लेकिन वे रक्तबीज को नहीं मार सकी। तब माता पार्वती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया। नवदुर्गा के इस रूप ने रक्तबीज का संहार किया। महाकाली का रौद्र रूप देखकर सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने मिलकर मां काली की स्तुति की तो मां भगवती ने उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि जो भी इस स्थान पर श्रृद्धाभाव से पूजा करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।


कालका जी का मंदिर हिंदूओं के लिए आस्था का केंद्र है। साथ ही यह मंदिर दिल्ली के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से भी एक है। मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 महीनों का संकेत देते हैं। हर द्वार के पास माता के विभिन्न रूपों का वर्णन देखने को मिलता है। मंदिर की परिक्रमा में 36 मातृकाओं के द्योतक हैं। माना जाता है कि ग्रहण में सभी ग्रह इनके अधीन होते हैं। दुनिया भर के मंदिर ग्रहण के वक्त बंद होते हैं, जबकि कालका मंदिर खुला रहता है।


आम दिनों में इस मंदिर में वेदोक्त, पुराणोक्त व तंत्रोक्त तीनों विधियों के साथ पूजा की जाती है। नवरात्रि के दौरान यहां विशाल मेला लगता है। मंदिर के भीतर अखंड दीप प्रज्जवलित है। श्रद्धालुओं का कहना है कि अष्टमी व नवमी के मेलों में मां भक्तों को दर्शन देने आती हैं।

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