Motivational Concept: दूसरों के प्रति मन में रखें ‘करुणा’ के भाव

Edited By Jyoti, Updated: 14 Jun, 2022 04:24 PM

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एक बार महाराष्ट्र में अकाल पड़ा। अन्न के अभाव से लोग भूख-प्यास से मरने लगे। धामण गांव के पटवारी माणकोजी बोधला उसी समय अकाल पीड़ितों की सेवा में तन-मन-धन से जुट गए।

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एक बार महाराष्ट्र में अकाल पड़ा। अन्न के अभाव से लोग भूख-प्यास से मरने लगे। धामण गांव के पटवारी माणकोजी बोधला उसी समय अकाल पीड़ितों की सेवा में तन-मन-धन से जुट गए। उन्होंने अपने घर तथा खेत के गोदामों में रखा सारा अनाज अकाल पीड़ितों को बांट डाला। लोग अभी भी भूख से मर रहे थे। पटवारी तथा उनकी पत्नी ने घर के समस्त आभूषण तथा पशु तक बेच कर अकाल पीड़ितों के लिए बाहर से अन्न मंगाकर बांट दिया।

माणकोजी ने देखा कि अभी भी मदद मांगने वाले अकाल-पीड़ितों का तांता लगा हुआ है। उन्होंने कुल्हाड़ी उठाई तथा जंगल में पहुंच गए। लकडिय़ां काटीं तथा उन्हें बेचकर मिले तीन पैसों में से एक पैसा भगवान को अॢपत किया तथा दो पैसे का आटा मंगाकर अकाल पीड़ितों और भूखों की प्रतीक्षा करने लगे।

लोगों को यह पता चल गया था कि माणकोजी अकाल पीड़ितों की सहायता से अपना सब कुछ गंवा चुके हैं। उन्हें दीन-हीन मानकर कोई उनके पास मांगने नहीं आया वह निराश होकर शैया पर लेट गए। उन्हें अपनी थकान या शारीरिक पीड़ा का उतना ध्यान नहीं था, जितना कि इस बात का दुख था कि वह अकाल पीड़ितों की मदद करने में पूरी तरह से समर्थ नहीं हो पा रहे थे।

तभी भगवान लक्ष्मी-नारायण ने ब्राह्मण-ब्राह्मणी का रूप धारण किया तथा माणकोजी के घर जा पहुंचे। माणकोजी ने उनके सामने पोटली खोलकर आटा रख दिया तथा कहा, ‘‘महाराज, रोटियां बनवाए देता हूं, उन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण कर लेना। घर ले जाने को देने के लिए अब मेरे पास कुछ नहीं बचा है।’’

देखते ही देखते ब्राह्मण-ब्राह्मणी के स्थान पर लक्ष्मी-नारायण प्रकट हो गए, जो भूख-पीड़ितों के प्रति करुणा की भावना से प्रसन्न होकर माणकोजी को आशीर्वाद दे रहे थे। उनकी कृपा से अनाज की कमी भी दूर हो गई। 

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