आखिर क्यों श्री हरि ने दिया नारद मुनि को बंदर का रूप?

Edited By Jyoti, Updated: 17 May, 2022 04:46 PM

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​​​​​​​17 मई दिन मंगलवार को देश के पहले पत्रकार कहलाने वाले नारद जी की जयंती मनाई जा रही है। प्रचलित धार्मिक किंवदंतियों के अनुसार इस दिन सृृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की गोद

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17 मई दिन मंगलवार को देश के पहले पत्रकार कहलाने वाले नारद जी की जयंती मनाई जा रही है। प्रचलित धार्मिक किंवदंतियों के अनुसार इस दिन सृृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की गोद से नारद जी का जन्म हुआ था। तो वहीं अन्य पुराणों में इनके जन्म को लेकर विभिन्न मान्यताएं वर्णित है। बात करें ब्रह्मवैवर्तपुराण की तो इसमें किए उल्लेख के मुताबिक नारद जी की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के कंठ से हुई थी। अतः इन्हीं सभी मान्यताओं के कारण नारद जी को ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक माना जाता है। आज इनकी जयंती के इस शुभ अवसर पर हम आपको इन्हीं से जुड़ी धार्मिक कथाओं से अवगत करवाने जा रहे हैं। आइए जानते हैं नारद जी तथा श्री हरि से जुड़ी रोचक पौराणिक कथा- 
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पौराणिक कथाओं के मुताबिक माता लक्ष्मी ऋषि भृगु की पुत्री थीं, जिनकी माता का नाम था ख्याति। एक बार की बात है लक्ष्मी जी के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया। परंतु माता लक्ष्मी मन ही मन विष्णु जी को पति के रूप में स्वीकार कर चुकी थीं। मगर ब्रह्मा जी के मानस पुत्र यानि नारद मुनि भी लक्ष्मी जी से विवाह करने के इच्छुक थे। उन्होंने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारद जी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए।

जिसके बाद भगवान विष्णु ने नारद जी की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद माता लक्ष्मी के स्वयंवर में पहुंचें तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उनके गले में ही वरमाला डालेगी, परंतु ऐसा नहीं हुआ। राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के ही गले में वरमाला डाली। जब इस कारण नारद जी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा, जिसे देख वह हैरान रह गए, उन्होंने देख कि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था।
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चूंकि नारद जी भगवान विष्णु को हरि रूप देने के लिए कहा था, इसलिए उन्होंने नारद जी को बंदर रूप दिया था। क्योंकि कहा जाता है हरि का एक अर्थ विष्णु होता है और एक अर्थ वानर भी होता है। इसलिए श्री हरि विष्णु  जी ने नारद मुनि को वानर रूप दिया था। 

अपना चेहरा देख नारद मुनि को ज्ञात हो गया कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया है, उन्हें भगवान विष्णु पर बड़ा क्रोध आया। जिसके उपरांत नारद जी सीधा बैकुंठ पहुंचें और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आप मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाएंगे। जिस तरह इस समय मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। कहा जाता है यही कारण है राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा।

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