10 जून को पड़ रही है निर्जला एकादशी, जानिए क्यों कहते हैं इसे पांडव या भीमसेनी एकादशी?

Edited By Jyoti, Updated: 03 Jun, 2022 02:51 PM

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इस बार निर्जला एकादसी का पर्व 10 जून दिन शुक्रवार को पड़ रही है। हिंदू धर्म के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली तमाम एकादशी तिथियों में से निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन व अत्यंत फलदायक माना जाता है। जिस तरह प्रत्येक

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इस बार निर्जला एकादसी का पर्व 10 जून दिन शुक्रवार को पड़ रही है। हिंदू धर्म के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली तमाम एकादशी तिथियों में से निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन व अत्यंत फलदायक माना जाता है। जिस तरह प्रत्येक एकादशी से जुड़ी धार्मिक कथाएं धर्म ग्रंथों में वर्णित हैं, ठीक उसी तरह निर्जला एकादशी से संबंधित धार्मिक कथा उल्लेखित है, जिसके चलते निर्जला एकादशी को पांडव व भीमसेना एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। तो आइए जानते हैं इन नामों से इस एकादशी को जाना जाने का असली कारण व पौराणिक कथा- 
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एक बार की बात है भीमसेन व्यासजी से कहा हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं परंतु मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता। जिस का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रत्येक मास की दोनों एकादशी तिथियों को अन्न मत खाया करो। भीम ने फिर कहा हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूं कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। 

अगर साल में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूं, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या मैं एक समय भी भोजन के बिना नहीं रह सकता। अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार करने से ही मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यास जी ने कहा हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। ठीक उसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।व्यासजी के ऐसे वचन सुनकर भीमसेन भयभीत हो गए और नरक में जाने के नाम से कांपकर कहने लगे कि अब क्या करूं? 
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एक मास में दो व्रत तो मैं नहीं कर सकता, परंतु हां वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न मैं अवश्य कर सकता हूं। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से अगर मेरी मुक्ति हो सकती है, तो कृपा ऐसा कोई व्रत बताइए। भीम को ऐसे डरता देखे व्यासजी ने भीम से कहा वृषभ और मिथुन की संक्रांति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। तुम अगर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हो तो इस निर्जला एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के अलावा जल वर्जित होता है। तो वहीं आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। कहा जाता है इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है। व्यासजी के अनुसार अगर इस एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न किया जाए तो समस्त एकादशी तिथियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों को दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करना चाहिए। मान्यता है इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशी तिथियों के समान होता है।

आगे व्यासजी ने भीमसेन से कहा इस व्रत के बारे में मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। व्यक्ति द्वारा केवल एक दिन निर्जल रहने से तमाम पापों से मुक्ति मिलती है। जो जातक निर्जला एकादशी का व्रत करता है, ऐसा कहा जाता है उन्हें मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। अतः श्रद्धा पूर्वक इस व्रत को करना चाहिए तथा उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण व गौदान करना चाहिए।
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धार्मिक कथाओं के अनुसार इस प्रकार व्यास जी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया अतः इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार निर्जला व्रत करने से पहले भगवान से प्रार्थना करना चाहिए कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूं, दूसरे दिन भोजन करूंगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूंगा, अत: आप अपनी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट करें दें। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढंक कर स्वर्ण सहित दान करना बेहद लाभकारी माना जाता है। 

हे कुंतीपुत्र भीम! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है उसके लिए अग्रलिखित कर्म करने आवश्यक होते हैं। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए, जल से भरे कलश का दान करना चाहिए। इसके अलावा इस दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान करना शुभदायक होता है। तो वहीं जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 
 

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