क्या है श्रावणी पुत्रदा एकादशी का शुभ मुहूर्त व पूजन विधि, जानने के लिए करें क्लिक

Edited By Jyoti,Updated: 07 Aug, 2022 10:06 AM

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सावन माह में पढ़ने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है श्रावण के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पुत्रदा एकादशी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर वर्ष सावन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाता है, जिसे मान्यताओं के अनुसार...

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
सावन माह में पढ़ने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है श्रावण के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पुत्रदा एकादशी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर वर्ष सावन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाता है, जिसे मान्यताओं के अनुसार पवित्रा एकादशी भी कहा जाता है। बात करें इस बार की पुत्रदा एकादशी व्रत की ते ये व्रत ये 08 अगस्त दिन सोमवार को रखा जाएगा। सोमवार होने के कारण इस व्रत को बेहद शुभ माना जा रहा है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान को सुखी जीवन प्राप्त होता है तो वही जो निसंतान दंपत्ति होती है उन्हें इस व्रत को करने से संतान सुख का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही नहीं इस व्रत को करने से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होने की मान्यता भी प्रचलित है। साथ ही पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा बनी रहती है। तो आइए जानते हैं पुत्रदा एकादशी व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व। 
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एकादशी का शुभ मुहूर्त-
हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 07 अगस्त दिन रविवार रात 11 बजकर 50 मिनट से होगा।और एकादशी तिथि का समापन 08 अगस्त दिन सोमवार को रात 9:00 बजे होगा.. उदय तिथि 08 अगस्त होने के कारण ये व्रत 08 अगस्त सोमवार को रखा जाएगा। यानि कि इस दिन भोलेनाथ के साथ साथ भगवान विष्णु की भी पूजा की जाएगी। पुत्रदा एकादशी का पारण समय 9 अगस्त, दिन मंगलवार को सुबह 5 बजकर 47 मिनट से सुबह 8 बजकर 26 मिनट तक होगा। इस दौरान व्रत खोलना शुभ माना जाता है। अगर आप ये व्रत रख रहें हैं तो आपको बता दें, पुत्रदा एकादशी का व्रत निर्जला और जल के साथ या फिर फलाहार रहकर अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं। व्रत रखने वालों को दशमी तिथि से ही सात्विक आहार खाना चाहिए। ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन भी करना चाहिए। 

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पूजा विधि-
व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर भगवान विष्णु। का स्मकरण करें।
फिर स्नाेन कर स्वठच्छव वस्त्र  धारण करें।
घर के मंदिर में श्री हरि विष्णुग की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और व्रत का संकल्पह लें।
अब भगवान विष्णु  को नैवेद्य और फलों का भोग लगाएं।
जैसा कि सब जानते हैं विष्णु जी को तुलसी बेहद प्रिय है, ऐसे में इनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग जरूर करना चाहिए।
श्री हरि विष्णुे को धूप-दीप दिखाकर विधिवत पूजा करें और आरती उतारें।
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पूरे दिन निराहार रहें।
शाम के समय पूजा कर कथा सुनने के बाद फलाहार ग्रहण करें।
रात्रि के समय जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें।
अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को खाना खिलाएं और उनको अपनी श्रद्धा के अनुसार दान दें।
अंत में खुद भी भोजन ग्रहण कर व्रत खोलें।
शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विधि- विधान से करने से मनवांशित फल की प्राप्ति होती है।
 

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