जीवन में जरूर करें इस चीज़ का सम्मान, वरना समाज में करवाओ अपना अपमान

Edited By Jyoti,Updated: 24 Jul, 2022 11:08 AM

value of time

जो समय बीत चुका है वह समय यदि यूं ही व्यर्थ चला गया तो उसे याद करने और उस पर रोने पछताने से कोई लाभ नहीं और जो समय भविष्य में आने वाला है उसके लिए कल्पनाओं के महल खड़े

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जो समय बीत चुका है वह समय यदि यूं ही व्यर्थ चला गया तो उसे याद करने और उस पर रोने पछताने से कोई लाभ नहीं और जो समय भविष्य में आने वाला है उसके लिए कल्पनाओं के महल खड़े करने और व्यर्थ की चिंता करने से भी कोई लाभ नहीं। भलाई इसी में है कि वर्तमान समय की कदर करो और जो समय तुम्हारे हाथ में है उसमें नाम एवं भक्ति की सच्ची कमाई करके अपना लोक-परलोक संवार लो। संसार की ओर यदि हम देखें तो संसार में लाखों करोड़ों व्यक्ति ऐसे मिलेंगे जो बीते हुए समय को और बीती हुई बातों को तथा घटनाओं को याद कर करके हर समय चिंतातुर और दुखी रहते हैं और अपने जीवन को नर्क-रूप बना लेते हैं।

इसके अतिरिक्त लाखों-करोड़ों व्यक्ति ऐसे भी मिल जाएंगे जो भविष्य की चिंता में घुलते रहते हैं कि न जाने हमारा भविष्य कैसा होगा?

आप लोगों ने सुना होगा कि जब कोई मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो संसार में आम बोलचाल की भाषा में यह कहा जाता है कि ‘अमुक व्यक्ति गुजर गया है’। गुजर गया का अर्थ है-जो अब नहीं रहा और जो व्यक्ति गुजर जाता है वह या तो कब्र में गाड़ दिया जाता है अथवा चिता में जला दिया जाता है।

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अब विचार करो कि यदि कोई मनुष्य किसी कब्र को खोद कर शव को निकाल ले और उसे गले लगाए तो उसे सिवाय दुर्गंध के और क्या प्राप्त होगा? ठीक इसी प्रकार जो मनुष्य गुजरे हुए समय अथवा गुजरी हुई बातों को गले लगाता है अर्थात उन्हें बार-बार स्मरण करता है तो उसे भी सिवाय दुर्गंध के अर्थात दुखों-चिंताओं के और कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

भूत का एक और अर्थ भी होता है। वह है-प्रेत अथवा पिशाच। जो व्यक्ति भूतकाल को याद करता रहता है, भूतकाल  में हुई बातों और घटनाओं को स्मरण करता रहता है, वह तो मानो स्वयं ही भूत को आमंत्रित करता है।

संसार में अनेकों मनुष्य आपको ऐसा करते हुए मिलेंगे कि कई वर्ष पहले की बात है, अमुक व्यक्ति ने मेरे साथ दुर्व्यवहार किया था और मुझे गालियां निकाली थीं। वे बातें मुझे तीर की तरह चुभती रहती हैं। मैं जब तक उससे बदला नहीं ले लूंगा, मुझे चैन नहीं मिलेगा। अब विचार करो कि बीती हुई बातों को याद करके जिसके दिल में हर समय बदले की चिंगारी सुलगती रहती हो, उसे सुख-शांति क्यों कर प्राप्त हो सकती है? वह तो सदा दुखी और परेशान भी बना रहेगा।

इंग्लैंड में एक डाक्टर सर आसलर हुए हैं। ‘सर’ की पदवी उन्हें इंग्लैंड के राजा की ओर से मिली थी। उन्होंने अपनी डायरी में एक स्थान पर लिखा है कि मैं जब डाक्टरी की अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी कर रहा था तो मुझे भविष्य की चिंता लग गई। पहली चिंता तो यह थी कि इस परीक्षा में सफल होऊंगा कि नहीं। कहीं ऐसा न हो कि मैं परीक्षा में असफल हो जाऊं। दूसरी चिंता यह लग गई कि यदि परीक्षा में सफल  हो गया तो आगे किस प्रकार अपना काम शुरू करूंगा और किस प्रकार अपना काम, आजीविका कमाऊंगा, क्योंकि दवाखाना खोलने के लिए जगह चाहिए और जगह के लिए धन चाहिए जो मेरे पास है नहीं।

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बस इन्हीं व्यर्थ की चिंताओं के बोझ तले दबा हुआ मैं हर समय अशांत रहने लगा। न नींद आती और न ही पढ़ने में मन लगता। संभव है इन चिंताओं में पड़कर मैं परीक्षा में असफल हो जाता अथवा अपना मानसिक संतुलन खो बैठता परन्तु इसे मेरा सौभाग्य कहिए कि एक दिन अकस्मात एक धार्मिक संस्था के भवन के बाहर लगे हुए ब्लैक बोर्ड पर मेरी दृष्टि पड़ी, जिस पर किसी महापुरुष के वचन लिखे हुए थे।  

मैंने उन वचनों को कई बार पढ़ा और उन्हें अपने हृदय में धारण कर लिया जिससे मेरे जीवन में एकदम  परिवर्तन आ गया और मैं सब चिंताएं छोड़ कर पढ़ाई में लग गया और अच्छे नंबरों से पास हुआ। आज जो कुछ भी मैं हूं और देश में मेरी जो ख्याति और इज्जत है, केवल उसी एक वचन पर आचरण करने के कारण ही है। वह वचन था :-
‘‘तुम्हारा यह कर्तव्य नहीं है कि तुम कल की चिंता में आज के समय और शक्ति को यूं ही नष्ट कर दो। आने वाला कल भी आज का रूप धारण कर ले, तब उसे परमेश्वर की अमूल्य देन समझकर उसका यथोचित आदर सत्कार करना।’’

आज संसार में अधिकतर लोग तो चिंताओं के कारण ही बीमार हैं क्योंकि उनके मन में भूत एवं भविष्य का अत्यधिक बोझ लदा होता है जो दीमक की तरह उनके जीवन को चट कर जाते हैं।
एक महात्मा जी एक स्थान पर प्रतिदिन सत्संग किया करते थे।  काफी संगत वहां सत्संग श्रवण करने के लिए एकत्र हो जाया करती थी। एक दिन कोई नया व्यक्ति सत्संग श्रवण करने वहां आया। सत्संग की समाप्ति पर उसने महात्मा जी से प्रश्र किया, ‘‘महात्मन। इन सत्संगियों में से कौन-सा मनुष्य सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है?’’ महात्मा जी ने एक सत्संगी की ओर संकेत करते हुए फरमाया-‘‘वह सत्संगी सदैव आनंद में रहता है। यह सुख से पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है।’’

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नए सत्संगी ने पुन: प्रश्न किया-‘‘महात्मन। कौन से गुण के आधार पर यह भाग्यशाली व्यक्ति प्रसन्न रहता है।?’’

महात्मा जी ने उत्तर दिया, ‘‘इस सत्संगी में यह गुण है कि-यह बीती को स्मरण नहीं करता और भविष्य की चिंता नहीं करता, वर्तमान को ध्यान में रख कर निरंतर भक्ति मार्ग पर अग्रसर होता हुआ यह सत्संगी सदा आनंदमय और सुखी जीवन व्यतीत करता है। अन्य सत्संगी जो इस समय यहां बैठे हैं वे भी इस वचन के सांचे में जीवन को ढालने का प्रयत्न कर रहे हैं और जितना जितना इनका आचरण है उतना-उतना सुख भी इनको प्राप्त है। दुखी और चिंतातुर तो सदा वे रहते हैं जो वर्तमान को भुलाकर भूत एवं भविष्य की चिंताओं में खोए रहते हैं।’’

महात्मा जी के इन वचनों को सुनकर नए सत्संगी ने महात्मा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और उपरोक्त वचन को जीवन में अपनाकर  अपना जीवन सुखमय बना लिया।

अत: हमारा कर्तव्य है कि इस कल्याणमय वचन के सांचे में अपने जीवन को ढालें। यदि हम इस पर आचरण करेंगे तो हमारी जीवन यात्रा भी सुखमय होगी और अपना परलोक भी हम संवार लेंगे। ऐसा ही आशीर्वाद श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने अपने पवित्र वचन में दिया है।

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