Smile please: दूसरों को ये चीज़ देने से बढ़ेगा आपका खजाना

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 04 Aug, 2022 12:27 PM

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​​​​​​​Ved vani वेद वाणी: वि द्वेषांसीनुहि वर्धयेलां मदेम शतहिमा: सुवीरा:। (ऋग्वेद 6/10/7) विद्वान पुरुषों का यह कर्तव्य है कि वे श्रेष्ठ कर्म करें और दूसरों से भी कराएं। इससे दोषों की निवृत्ति और बल, बुद्धि, विद्या तथा आयु में वृद्धि होती है।

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Ved vani वेद वाणी: वि द्वेषांसीनुहि वर्धयेलां मदेम शतहिमा: सुवीरा:। (ऋग्वेद 6/10/7)

विद्वान पुरुषों का यह कर्तव्य है कि वे श्रेष्ठ कर्म करें और दूसरों से भी कराएं। इससे दोषों की निवृत्ति और बल, बुद्धि, विद्या तथा आयु में वृद्धि होती है। 

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विद्वान किसे कहते हैं? 
जिसे भौतिक सृष्टि एवं पदार्थों का ज्ञान हो। जो मानव समाज की जानकारी रखते हों। जो जीवन निर्माण के सिद्धांतों को समझते हों। जो आत्मविद्या और ब्रह्मविद्या से बखूबी परिचित हों।

किसी वस्तु के यथावत स्वरूप को जानना ही ज्ञान कहलाता है। विद्या और अविद्या के भेद को जानने वाला विद्वान होता है।
विद्या और ज्ञान का सामान्य अभिप्राय भाषाओं, सामाजिक और विज्ञान संबंधी विषयों से है। इनका विशेष अभिप्राय आत्मविद्या, ब्रह्मविद्या और समाधि द्वारा जड़ और चेतन के ज्ञान से है।

ज्ञान से अभिप्राय उस सूत्र अथवा वाक्य से भी है जिसके कारण मनुष्य के जीवन का उद्धार हो जाता है अथवा सोई हुई आत्मा जाग उठती है। विद्या धन ही सब धनों में सर्वश्रेष्ठ है। ऐसी विद्या और ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति ही विद्वान कहलाते हैं। ऐसे ज्ञानी और विद्वान व्यक्तियों के संसर्ग से सदैव मनुष्य में दानशीलता एवं अहिंसा की भावना और ज्ञान की वृद्धि होती है। सत्संग सदा ही मनुष्य का उद्धार करता है। सत्संग के कारण बड़े-बड़े पतित व्यक्ति भी नारकीय जीवन से ऊंचे उठकर स्वर्गिक जीवन को प्राप्त हुए हैं।

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महापुरुषों के जीवन ऐसे उदाहरणों से अटे पड़े हैं। अंगुलिमाल और आम्रपाली का जीवन महात्मा बुद्ध की संगति से किस प्रकार बदल गया। श्रेष्ठ और विद्वान व्यक्तियों का यह कर्तव्य है कि वे अपने अर्जित ज्ञान का उपयोग केवल अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ही न करें वरन अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को उसका लाभ दें।

ज्ञान देने से घटता नहीं, बढ़ता ही है। इससे दोनों का लाभ होता है।

दुर्गुणों के नाश और सद्गुणों की वृद्धि से दीर्घायु प्राप्त होती है।

जो व्यक्ति अपने ज्ञान और अनुभव का लाभ दूसरों को देने में कंजूसी बरतते हैं, वे पशु समान ही हैं। उनका संचित ज्ञान स्वयं उनके काम भी नहीं आता और धीरे-धीरे उसकी प्रखरता नष्ट होती जाती है।

जो ज्ञान अर्जित किया है, उससे सारे समाज को लाभान्वित करना मनुष्य का धर्म है। वही सच्चे विद्वान कहलाते हैं। चरित्रवान विद्वानों का यही कर्तव्य है।

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