‘Clean Internet’ campaign: नेपाल-तिब्बत तबाही की खबरों पर चीन ने लगाया बैन, सही आंकड़ा बताने वालों पर की कार्रवाई

Edited By Updated: 08 Sep, 2026 05:12 PM

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नेपाल-तिब्बत बाढ़ के बाद चीन के ‘Clean Internet 2026’ अभियान को लेकर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, आपदा से जुड़ी कथित अफवाहों पर 10 मामलों में कार्रवाई हुई और सोशल मीडिया पोस्ट हटाए गए। मानवाधिकार समूह पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि चीन...

Bejing: नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन के इंटरनेट नियंत्रण को लेकर सवाल उठ रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, आपदा से जुड़ी ऐसी जानकारियों और सोशल मीडिया पोस्ट पर कार्रवाई की गई, जिन्हें चीनी अधिकारी ‘अफवाह’ या गलत सूचना मानते हैं। चीन में ‘Clean Internet 2026’ नाम से चल रहे अभियान का इस्तेमाल पहले मुख्य रूप से साइबर अपराध और हैकिंग जैसी गतिविधियों के खिलाफ किया जाता था। लेकिन अब मानवाधिकार और मीडिया निगरानी से जुड़े समूहों का आरोप है कि इसका दायरा ऑनलाइन सूचनाओं और सरकार की आधिकारिक कहानी से अलग दावों तक भी बढ़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, बाढ़ के शुरुआती घंटों में चीनी सोशल मीडिया पर आपदा को लेकर लोगों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ी। विषय ट्रेंड भी करने लगा, लेकिन कुछ समय बाद कई टिप्पणियां और पोस्ट हटाए जाने लगीं।

 

1000 से ज्यादा लोग बह गए’ पोस्ट करने पर कार्रवाई
चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म WeChat पर कुछ यूजर्स को कथित तौर पर उनके पोस्ट हटाए जाने की सूचना मिली। एक मामले में पोस्ट को ‘राजनीतिक रूप से संवेदनशील सामग्री’ बताया गया, जबकि एक अन्य पोस्ट को साझा करने से रोक दिया गया। चीन की मीडिया पर नजर रखने वाले China Media Project के निदेशक डेविड बैंडुर्स्की के अनुसार, इसे केवल अचानक हुई ‘क्रैकडाउन’ की कार्रवाई कहना पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक, चीन में जनमत को नियंत्रित करने की नीति लगातार और रोजाना लागू की जाती है। आपदा के चार दिन बाद, 30 अगस्त को तिब्बत की पुलिस ने ‘Clean Internet 2026’ अभियान के तहत बाढ़ से जुड़ी 10 घटनाओं में कार्रवाई की जानकारी दी। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर मामलों में सोशल मीडिया पर यह दावा किया गया था कि बाढ़ में 1,000 से ज्यादा लोग बह गए।

 

826 लोगों के लापता होने का दावा भी पड़ा भारी
चीन के अधिकारियों ने अब तक तिब्बत में इस आपदा से 43 लोगों की मौत की जानकारी दी है। वहीं, मानवाधिकार और तिब्बती संगठनों ने चीन पर आपदा के वास्तविक पैमाने और मृतकों की संख्या छिपाने का आरोप लगाया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस के अनुसार, ऐसी ‘अफवाहें’ लोगों को गुमराह करती हैं और ऑनलाइन व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। अधिकारियों ने कार्रवाई को राहत एवं बचाव कार्य सुचारु रखने की जरूरत से भी जोड़ा। पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के जियांग्शी प्रांत में रहने वाले एक व्यक्ति ने वीडियो प्लेटफॉर्म पर दावा किया था कि लापता लोगों की संख्या बढ़कर 826 हो गई है।  रिपोर्ट में कहा गया कि इस व्यक्ति के खिलाफ ‘प्रशासनिक कार्रवाई’ की गई। हालांकि, कार्रवाई का सटीक स्वरूप सार्वजनिक नहीं किया गया।

 

‘कौन लापता है’ पर कम जानकारी?
एक पूर्व चीनी सरकारी मीडिया पत्रकार ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर कहा कि संकट के समय सूचना नियंत्रण केवल पोस्ट हटाने तक सीमित नहीं रहता। उनके अनुसार, सरकारी कवरेज में राहत और बचाव के लिए राज्य की कोशिशों को काफी जगह मिलती है, लेकिन लापता लोगों की पहचान, आखिरी बार वे कहां देखे गए और किन इमारतों की तलाशी ली गई जैसे सवालों पर अपेक्षाकृत कम जानकारी दी जाती है। उनका कहना था कि इंटरनेट पर नियंत्रण पहले से ज्यादा सख्त हुआ है, हालांकि कुछ लोग तेजी से पोस्ट करने या संकेतों और घुमावदार भाषा का इस्तेमाल करके प्रतिबंधों से बचने की कोशिश करते हैं।

 

एक पूर्व CGTN संपादक के मुताबिक, सरकार को सही जानकारी हासिल करने के लिए पत्रकारों की जरूरत भी होती है। पत्रकारों की रिपोर्टिंग से प्रशासन को जमीनी स्थिति समझने में मदद मिल सकती है। लेकिन दूसरी तरफ, पूरी तरह स्वतंत्र रिपोर्टिंग से ऐसी जानकारियां भी सामने आ सकती हैं जो सरकार के लिए राजनीतिक रूप से असहज हों या राज्य के हितों को चुनौती दें। यही वजह है कि आपदा के दौरान सूचना नियंत्रण और वास्तविक स्थिति की जानकारी के बीच तनाव पैदा होता है।

 

तिब्बती परिवारों की बढ़ी चिंता
इस पूरी स्थिति का सबसे भावनात्मक असर उन परिवारों पर पड़ रहा है जिनके लोग नेपाल और तिब्बत दोनों तरफ लापता हैं।  भारत के दक्षिणी हिस्से में रहने वाले 46 वर्षीय तिब्बती शरणार्थी त्सेरिंग फुंत्सोक ने बताया कि सीमा के दोनों ओर उनके परिवार के सदस्य लापता हैं। नेपाल में कुछ लोगों के नाम सरकारी सूचियों में हैं, लेकिन तिब्बत में उन्हें अपने परिजनों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। नई दिल्ली में रहने वाले तिब्बती पत्रकार कालसांग जिग्मे ने दावा किया कि आमतौर पर ऐसी आपदाओं के दौरान लोग प्रभावित परिवारों के लिए प्रार्थना करते हैं, मदद जुटाते हैं और राहत सामग्री भेजते हैं। लेकिन इस बार तिब्बत में लोगों की आवाज काफी हद तक दब गई है।

 

‘क्लीन इंटरनेट’ पर उठे सवाल
मानवाधिकार और तिब्बती संगठनों का आरोप है कि चीन की इंटरनेट नीति अब केवल साइबर अपराध रोकने तक सीमित नहीं रह गई है। उनके अनुसार, इसका इस्तेमाल ऐसी ऑनलाइन जानकारियों को नियंत्रित करने के लिए भी किया जा रहा है जो आधिकारिक सरकारी नैरेटिव से अलग हों। हालांकि, चीन का पक्ष यह है कि गलत सूचना और अफवाहों को रोकना जरूरी है, खासकर प्राकृतिक आपदा के समय, जब गलत जानकारी राहत और बचाव अभियान को प्रभावित कर सकती है।यही विवाद इस आपदा को सिर्फ बाढ़ और राहत का मुद्दा नहीं रहने देता, बल्कि सूचना की स्वतंत्रता, सरकारी पारदर्शिता और सोशल मीडिया नियंत्रण से जुड़ा बड़ा सवाल भी बना देता है।
 

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