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छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश के 3 पूर्व CM का क्या होगा, चिंतन शुरू

छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश के 3 पूर्व CM का क्या होगा, चिंतन शुरू

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के हाथों हार मिलने के बाद अब भाजपा के इन तीनों राज्यों के सी.एम. के भविष्य को लेकर चिंतन शुरू हो गया है। इनमें से 2 लगातार 3 बार से मुख्यमंत्री थे, जबकि वसुंधरा राजे सिंधिया ने 5 वर्ष पहले ही यह पद सम्भाला था। ऐसे में अब पार्टी इस बात पर विचार कर सकती है कि इन तीनों पूर्व सीएम को लोकसभा चुनाव तक राज्य में ही विपक्ष का नेता बनाकर रखा जाए या फिर उन्हें दिल्ली में कोई जिम्मेदारी दी जाए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि अभी नतीजे ही आए हैं इसलिए इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। हालांकि पार्टी के पास दो ही विकल्प हैं।
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विपक्ष की जिम्मेदारी
तनों ही पूर्व सीएम अपना चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं इसलिए पार्टी में एक राय तो यही है कि उन्हें फिलहाल लोकसभा चुनाव तक वहीं विपक्ष का नेता बनाए रखा जाए। 3-4 माह बाद जब लोकसभा चुनाव हों तो उन्हें लोकसभा का टिकट दिया जाए। इससे इन तीनों की सीट जीतना पार्टी के लिए आसान हो जाएगा। हालांकि इस बात की आशंका है कि वसुंधरा राजे सिंधिया दिल्ली आकर राजनीति करने के लिए तैयार न हों। फिर भी पार्टी नेतृत्व की कोशिश होगी कि तीनों ही नेताओं को लोकसभा चुनाव लड़ाया जाए और अगर सरकार बनती है तो उन्हें कैबिनेट में जिम्मेदारी दी जाए। ऐसे में अगर वसुंधरा अड़ती हैं तो उस स्थिति में पार्टी कोई कड़ा फैसला ले सकती है।
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कराई जाए केन्द्र की राजनीति
पार्टी के पास दूसरा विकल्प यह है कि इन तीनों नेताओं को अभी विधानसभा से त्यागपत्र दिलाकर दिल्ली लाया जाए। हालांकि इसमें पार्टी को फायदा नजर नहीं आता, क्योंकि इन तीनों के इस्तीफे देने पर अगर विधानसभा का उपचुनाव होगा तो यह भी हो सकता है कि वहां कांग्रेस ही जीत जाए। ऐसे में पार्टी को और अधिक नुक्सान होगा।
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राजस्थान की चिंता
भाजपा की अधिक चिंता राजस्थान की पूर्व सी.एम. वसुंधरा को लेकर है। अतीत के अनुभव से पार्टी को लग रहा है कि वह शायद ही केन्द्र में आने के लिए तैयार हों। ऐसे में पार्टी यह नहीं चाहेगी कि लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा लगे कि पार्टी के भीतर ही तनातनी शुरू हो गई है। ऐसे में उनके लिए दूसरे विकल्पों को तलाशा जा रहा है। इसकी वजह यह है कि 2008 में जब राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार हुई थी, उस वक्त के पार्टी नेतृत्व ने उन्हें विपक्ष के नेता का पद छोडऩे के लिए कहा था, लेकिन वह तैयार नहीं हुई थीं।

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