Edited By Parveen Kumar,Updated: 13 May, 2026 05:42 PM

भारत में सोना-चांदी सिर्फ निवेश का जरिया नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं और परंपराओं से भी जुड़ा है। आमतौर पर विवाह-शादी के साथ-साथ धार्मिक कार्यक्रमों में भी इन आभूषणों की जरुरत पड़ती है। भारत में ज्यादातर सोना विदेशों से खरीदा जाता है, क्योंकि जब...
नेशनल डेस्क : भारत में सोना-चांदी सिर्फ निवेश का जरिया नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं और परंपराओं से भी जुड़ा है। आमतौर पर विवाह-शादी के साथ-साथ धार्मिक कार्यक्रमों में भी इन आभूषणों की जरुरत पड़ती है। भारत में ज्यादातर सोना विदेशों से खरीदा जाता है, क्योंकि जब ज्यादा सोना आयात होता है तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे भारतीय रुपया कमजोर होने लगता है। इसी वजह से सरकार समय-समय पर सोने-चांदी पर लगने वाली इम्पोर्ट ड्यूटी यानी आयात शुल्क में बदलाव करती रहती है, ताकि डॉलर की बचत हो सके और अर्थव्यवस्था संतुलित रहे।
बीते दिनों ने पीएम मोदी ने अपने संबोधन में गोल्ड न खरदीने की अपील की थी और अब सरकार ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15% कर दिया है, जिसमें बेसिक ड्यूटी और सेस दोनों शामिल थे। आजादी के बाद भी सरकार ने कई बार सोने पर सख्ती की, फिर 1962 और 1968 में ‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ लागू किया गया था। इसके तहत लोगों के पास कितना सोना रखा जा सकता है, इस पर कड़े नियम बनाए गए थे। बाद में 1990 के आर्थिक संकट के दौरान भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी कमी आ गई थी. उस समय सरकार ने यह कानून खत्म कर दिया और सोने पर आसान आयात शुल्क व्यवस्था लागू की. तब 10 ग्राम सोने पर 250 रुपये शुल्क लगाया गया था
मनमोहन सिंह सरकार के समय भी सोने पर कई बार इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाई गई। साल 2012 के बजट में सोने पर शुल्क 2% से बढ़ाकर 4% कर दिया गया। इसके बाद 2013 में रुपये की कीमत गिरने और चालू खाता घाटा बढ़ने पर सरकार ने लगातार ड्यूटी बढ़ाई। जनवरी 2013 में इसे 6%, जून में 8% और अगस्त 2013 में बढ़ाकर 10% कर दिया गया। उसी दौरान ‘80:20 नियम’ भी लागू किया गया, जिसके तहत आयात किए गए सोने का 20% हिस्सा निर्यात करना जरूरी था।