कांग्रेस के 5 बड़े मुद्दे, जिनको सुलझाने के लिए संकच मोचक बने अहमद पटेल

Edited By Anil dev, Updated: 26 Nov, 2020 12:26 PM

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल 71 साल की उम्र में कोरोना से निधन हो गया। अहमद पटेल सियासी नब्ज को बखूबी समझने और पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने में महारत रखने वाले एक ऐसा नेता थे जिन्होंने कांग्रेस के मामलों पर मजबूत पकड़ भी बनाए रखी और पिछले दो...

नेशनल डेस्क: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल 71 साल की उम्र में कोरोना से निधन हो गया। अहमद पटेल सियासी नब्ज को बखूबी समझने और पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने में महारत रखने वाले एक ऐसा नेता थे जिन्होंने कांग्रेस के मामलों पर मजबूत पकड़ भी बनाए रखी और पिछले दो दशकों में पार्टी को कई संकटों से निकालने, मजबूत बनाने एवं सत्ता तक पहुंचाने में अहम किरदार निभाया। आईए जानते हैं वो पांच बड़े मुद्दे जब कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले अहमद पटेल ने पार्टी में अहम भूमिका निभाई। 

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शरद पवार की पार्टी से गठबंधन के लिए राजी किया
शरद पवार जैसे नेता ने 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर अलग पार्टी बना ली। एनडीए की 13 महीने पुरानी वाजपेयी सरकार गिरने के बाद कांग्रेस तीन चुनाव हार गई थी और कई नेता पार्टी छोडऩे लगे थे। जितेंद्र प्रसाद, राजेश पायलट जैसे दिग्गज नेतृत्व को चुनौती दे रहे थे। इस दौर में अहमद पटेल ने पार्टी के सभी नेताओं को जोडऩे और हाईकमान के बीच सेतु बनने की सबसे अहम भूमिका निभाई। यह अहमद पटेल ही थे कि कांग्रेस से अलग होने के छह महीने बाद ही महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए शरद पवार की पार्टी से 1999 में गठबंधन के लिए राजी किया और कांग्रेस-एनसीपी को बचाने में अहम भूमिका निभाई। अहमद पटेल की वजह से ही आज भी इन दोनों पार्टियों में गठबंधन अटूट है। 

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सोनिया गांधी को राजनीति में स्थापित करने में अहमद पटेल का अहर रोल
सोनिया गांधी को राजनीति में स्थापित करने का श्रेय अहमद पटेल को ही जाता है। वह सोनिया गांधी के सलाहकार के रूप में भी काम कर चुके है। 90 के दशक में कांग्रेस के लिए संकट मोचन के तौर पर भी अहमद पटेल उभरे थे। 1977 आपातकाल लगने के बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की साख बचाने का काम अहमद पटेल ने ही किया था। वह गुजरात के भरुच लोकसभा में सबसे युवा सांसद बनकर पहुंचे थे। इसके बाद 1980 और 1984 में इसी भरुच सीट से जीतकर सांसद पहुंचे थे। 1980 में कांग्रेस की वापसी के बाद जब इंदिरा गांधी ने अहमद को कैबिनेट में शामिल करना चाहा, तो उन्होंने संगठन में काम करने को प्राथमिकता दी।

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अमर सिंह को समर्थन के लिए किया तैयार कर रातोरात पलटी बाजी
अहमद पटेल को कांग्रेस पार्टी का चाणक्य माना जाता था। पार्टी के संकट मोचक कहे जाने वाले अहमद पटेल ने 2008 में अमेरिका से हुए परमाणु समझौते के मुद्दे पर वामदलों के समर्थन वापस लेने के बाद यूपीए वन सरकार गिरने की नौबत आ गई थी, तब पटेल ने ही अमर सिंह के जरिए रातोरात समाजवादी पार्टी का समर्थन हासिल कर बाजी को पलट दिया था। पार्टी की हर चुनौती के वक्त अहमद पटेल ने अपने राजनीतिक कौशल की जबरदस्त क्षमता दिखाई। तभी कांग्रेस के हर मर्ज की दवा अहमद पटेल के पास होने की दिग्विजय सिंह की बात उनकी इसी काबिलियत को जाहिर करती है। केवल 27 वर्ष की उम्र में 1977 में लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र की राजनीति में आए अहमद पटेल की अपने लिए पद की लालसा कभी नहीं दिखी। दस साल के यूपीए शासन में उन्होंने कांग्रेस और सोनिया गांधी के साथ वफादारी को ही सर्वोच्च रखा। 

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2004 में यूपीए के गठन में निभाई खास भूमिका
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद अहमद पटेल ने 2004 के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बनाने में अमह रोल अदा किया था। पटेल ने सोनिया के विश्वास्त सहयोगी के तौर पर गठबंधन को मजबूत किया। उन्होंने कांग्रेस के संसदीय सचिव, कोषाध्यक्ष और गुजरात इकाई के अध्यक्ष के तौर पर अलग-अलग जिम्मेदारियों को उठाया। अहमद पटेल ने खुद बताया था कि उन्हें राजीव गांधी की सरकार में मंत्री पद ऑफर हुआ था। मनमोहन सिंह सरकार में भी उन्हें दो बार मंत्री पद ऑफर किया गया था। हालांकि, उन्होंने सरकार में रहने के बजाय पार्टी के लिए काम करना बेहतर समझा।

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पार्टी में उठी बगावत को शांत करने में निभाई अहम भूमिका
ठीक तीन महीने पहले अगस्त महीने में पटेल ने पार्टी के भीतर उठ रही बगावत की आग पर भी काबू पाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. 23 पार्टी नेताओं ने सोनिया गांधी के खिलाफ रुख अपनाया तो पटेल ने इस कोशिश को विफल करने में भी अपने रणनीतिक कौशल का इस्तेमाल कर संकट को टाल दिया था, जिसके बाद कांग्रेस कार्य समिति के माध्यम से पार्टी ने सोनिया के नेतृत्व में एक बार फिर विश्वास जताया। 
 

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