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राजस्थान विधानसभा चुनाव में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर

राजस्थान विधानसभा चुनाव में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर

जयपुर(मुकेश चौधरी): राजस्थान का मौजूदा विधानसभा के चुनाव दिग्गज नेताओं के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। कुछ नेताओं के लिए तो सियासी तौर पर जीने-मरने का सवाल बन गया है। अपने रिश्तेदारों को चुनाव लड़ाकर दिग्गज नेताओं ने अपने लिए रात और दिन का चैन खत्म कर लिया है। अब इनकी हार और जीत उनके सियासी भाग्य की भी नई इबारत लिखेगी। चुनावों के परिणाम नई विधानसभा की तस्वीर तो लिखेंगे ही, साथ ही उन दिग्गज नेताओं के सियासी भाग्य का फैसला भी करेंगे, जिनके लिए यह चुनाव आखिरी हो सकता है। कुछ दिग्गजों ने अपने रिश्तेदारों को चुनावी समर में उतारकर चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है। मौजूदा चुनाव इनकी साख भी तय करेंगे, जिनमें से कुछ चेहरे तो ऐसे हैं, जो राजस्थान विधानसभा की बरसों से शान रहे हैं। लेकिन जनादेश ने साथ नहीं दिया तो यह उनकी आखिरी सियासी पारी साबित हो सकती है। यूं तो राजनीति के लिए कोई आयु सीमा नहीं होती, इसके बावजूद चुनाव सीधे तौर पर राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़े रहते हैं। क्षेत्रीय धाक को भी यह चुनाव परिणाम तय करते हैं। 
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घनश्याम तिवाड़ी-सांगानेर से भारत वाहिनी के प्रत्याशी
तिवाड़ी के लिए यह चुनाव सियासी तौर पर जीवन-मरण से कम नहीं है। विधानसभा में वह अपने आप में चलती-फिरती संसदीय किताब हैं ।तिवाड़ी का विधानसभा का कैरियर स्वर्णाक्षरों से सज्जित है। मौजूदा सांगानेर का चुनाव उनकी साख से जुड़ा है। अगर हारे तो राजनीतिक प्रतिष्ठा और कद दोनों को नुकसान होगा। भारत वाहिनी दल का अस्तित्व भी तिवाड़ी के चुनावी कैरियर से जुड़ा है।

देवी सिंह भाटी-भाजपा के वरिष्ठ नेता
देवी सिंह भाटी की बहू कोलायत से भाजपा उम्मीदवार हैं। भाटी गत चुनाव कोलायत से हार गये थे अब यह मौजूदा चुनाव उनके लिए राजनीति प्रतिष्ठा से कम नहीं है। बीकाणा में भाटी की धाक अब उनकी बहू की हार-जीत तय करेगी।

बीडी कल्ला-कांग्रेस प्रत्याशी, बीकानेर पश्चिम
कल्ला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पीसीसी अध्यक्ष हैं। उनके लिए टिकट की राह पहली बार इतनी कठिन रही। पार्टी ने पॉलिसी तोड़कर उन्हें टिकट थमाया। कल्ला के लिए यह चुनाव सियासत की नई कहानी लिख सकता है।

काका सुंदर लाल-वरिष्ठ भाजपा नेता
काका के बेटे पिलानी से बीजेपी के टिकट पर मैदान में। यह चुनाव उनके पुत्र के कारण उनकी साख से जुड़ा है। शेखावाटी में बरसों पुरानी उनकी धाक इस चुनाव पर टिकी है।

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कर्नल सोनाराम-भाजपा प्रत्याशी, बाड़मेर
वर्तमान सांसद सोनाराम एमएलए का चुनाव लड़ रहे हैं। बाड़मेर के परिणाम उनके सियासी कद को प्रभावित करेंगे। सीमावर्ती क्षेत्र में उनकी धाक मौजूदा चुनाव पर आधारित है।

गुलाब चंद कटारिया-प्रत्याशी भाजपा, उदयपुर शहर
गुलाब चंद कटारिया के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है।राजनीति के इस चुनावी पड़ाव पर उन्हें प्रबल चुनौती मिली है। मेवाड़ में उनकी प्रतिष्ठा इस चुनाव से जुड़ी है।

डॉ. किरोड़ीलाल मीणा-वरिष्ठ भाजपा नेता
डॉ. किरोड़ी लाल मीणा खुद चुनावी समर में नहीं उतरे। उनकी पत्नी गोलमा और भतीजा राजेंद्र मैदान में हैं। सपोटरा में भीषण चुनावी संग्राम से उन्हे जूझना पड़ रहा है। प्रबल विरोधी के सामने पत्नी को जिताना बडी चुनौती है। कमोबेश यही हालात महवा की सीट पर भी है। महवा में राजेंद्र का चुनाव भी उनकी साख से जुड़ा है।

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डॉ. सीपी जोशी-कांग्रेस प्रत्याशी, नाथद्वारा
गुदड़ी के लाल के लिए नाथद्वारा बेहद खास है।एक वोट की हार ने प्रतिष्ठा को पहले भी आंच पहुंचाई है। सियासी शिष्य के सामने ये चुनाव सियासी चुनौती है।

गिरिजा व्यास-कांग्रेस प्रत्याशी, उदयपुर शहर
गिरिजा व्यास के लिए यह चुनाव राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है। अपने पुराने शहर में यह चुनाव उनकी सियासी साख से जुड़ा है। कटारिया के सामने चुनाव बेहद चुनौतीपूर्ण है। 

जोगेश्वर गर्ग-भाजपा प्रत्याशी, जालोर
विधायक और मंत्री रह चुके है जोगेश्वर गर्ग को कठिन डगर पार करने के बाद टिकट मिला। इस बार का चुनाव इस पुराने दिग्गज के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न है। इस चुनाव में दलित नेता को साबित करनी उनकी साख होगी ।

विश्वेंद्र सिंह-कांग्रेस प्रत्याशी, डीग-कुम्हेर
भरतपुर के पूर्व महाराजा वर्तमान में यहीं से कांग्रेस विधायक हैं।  इस बार उनके मित्र के पुत्र हैं चुनावी समर में हैं। विश्वेंद्र सिंह के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल है। अंतिम क्षणों में नदबई जाने की सोची, फिर मन बदला। डीग-कुम्हेर में डॉ. दिगम्बर से वे एक बार चुनाव हार चुके हैं। अपने जीवन के अंतिम सफर में दिगम्बर ने उनसे मित्रता की। दिगम्बर के पुत्र शैलेश के सिर पर उनसे हाथ रखवाया गया। अब शैलेश ही विश्वेंद्र के लिए साख का सवाल हैं।

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