Edited By Anu Malhotra,Updated: 25 Oct, 2025 04:20 PM

भारत समेत दुनिया भर के लाखों किचन में टपरवेयर के डिब्बे कभी ‘क्वालिटी’ की पहचान माने जाते थे। पारदर्शी प्लास्टिक के ये कंटेनर सिर्फ खाने को ताज़ा नहीं रखते थे, बल्कि टिकाऊपन के मामले में लाजवाब थे। लेकिन वही टिकाऊपन अब कंपनी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द...
नेशनल डेस्क: भारत समेत दुनिया भर के लाखों किचन में टपरवेयर के डिब्बे कभी ‘क्वालिटी’ की पहचान माने जाते थे। पारदर्शी प्लास्टिक के ये कंटेनर सिर्फ खाने को ताज़ा नहीं रखते थे, बल्कि टिकाऊपन के मामले में लाजवाब थे। लेकिन वही टिकाऊपन अब कंपनी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया।
जब मजबूती बनी मुसीबत
टपरवेयर ने शुरुआत से ही अपने ग्राहकों से वादा किया था - “एक बार खरीदो, जिंदगीभर चलाओ।” कंपनी ने यह वादा पूरा भी किया। लेकिन यही वादा धीरे-धीरे उसके कारोबार की सबसे बड़ी गलती बन गया। कंटेनर इतने मजबूत निकले कि ग्राहकों को नए प्रोडक्ट की जरूरत ही नहीं पड़ी। नतीजा - बिक्री रुक गई, और मुनाफे की मशीन ठप पड़ गई।
कभी किचन की शान, अब बंद होने की कगार पर
1940 के दशक में अमेरिका में शुरू हुई यह कंपनी एक समय घरेलू नाम बन गई थी। ‘टपरवेयर पार्टी’ का कॉन्सेप्ट उस दौर में बेहद सफल रहा — जहां महिलाएं घरों में इकट्ठा होकर कंपनी के डिब्बों का प्रदर्शन और बिक्री करती थीं। टपरवेयर की पहचान थी — “कभी खराब न होने वाला उत्पाद।” लेकिन समय बदला, उपभोक्ता व्यवहार बदला, और वही स्ट्रॉन्ग प्रोडक्ट कंपनी के लिए कमज़ोर बिजनेस मॉडल साबित हुआ।
बाजार में आई सस्ती चुनौती
-जब टपरवेयर के पुराने कंटेनर सालों-साल चलने लगे, लोग नए खरीदना बंद करने लगे।
-इसी बीच, बाजार में कम कीमत वाले प्लास्टिक स्टोरेज बॉक्स की भरमार हो गई।
-लोगों को लगा — “जब सस्ता विकल्प मिल रहा है, तो महंगे टपरवेयर की क्या जरूरत?”
-टपरवेयर ने बदलते ट्रेंड्स के अनुसार न तो अपने डिज़ाइन में बड़ा बदलाव किया, न ही नए उत्पादों में निवेश किया।
डिजिटल युग में चूकी कंपनी
जहां बाकी ब्रांड्स ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर छा गए, टपरवेयर पुराने डायरेक्ट सेल्स मॉडल पर टिकी रही।
उसकी पारंपरिक “पार्टी सेलिंग” रणनीति सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स के युग में पुरानी लगने लगी।
डिजिटल मार्केटिंग की दौड़ में कंपनी पीछे रह गई, और सस्ते ब्रांड्स ने बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया।