Edited By Purnima Singh,Updated: 24 May, 2026 12:54 PM

देश में भीषण गर्मी के साथ बिजली की खपत लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है। केंद्र सरकार इसे बिजली व्यवस्था की मजबूती का संकेत बता रही है, लेकिन दूसरी तरफ कई राज्यों से लगातार बिजली कटौती और लो-वोल्टेज की शिकायतें सामने आ रही हैं ...
नेशनल डेस्क : देश में भीषण गर्मी के साथ बिजली की खपत लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है। केंद्र सरकार इसे बिजली व्यवस्था की मजबूती का संकेत बता रही है, लेकिन दूसरी तरफ कई राज्यों से लगातार बिजली कटौती और लो-वोल्टेज की शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब उत्पादन पर्याप्त बताया जा रहा है, तो आखिर लोगों तक निर्बाध बिजली क्यों नहीं पहुंच पा रही?
हाल ही में देश में बिजली की अधिकतम मांग 271 गीगावॉट के करीब पहुंच गई, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है। हालांकि इस बढ़ती मांग के बीच करीब 1.7 गीगावॉट की कमी भी दर्ज की गई, जिसका असर कई इलाकों में कटौती और ब्लैकआउट के रूप में दिखाई दिया। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संकट सरकारी आंकड़ों से कहीं बड़ा हो सकता है।
“छुपी हुई बिजली कटौती” का बढ़ता संकट
विशेषज्ञों के अनुसार कई स्थानीय बिजली कंपनियां सिस्टम पर दबाव कम करने के लिए कुछ इलाकों की सप्लाई जानबूझकर रोक देती हैं, लेकिन इन कटौतियों का पूरा रिकॉर्ड आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि कई शहरों और कस्बों में लोग घंटों बिजली संकट झेल रहे हैं, जबकि कागजों में स्थिति सामान्य बताई जाती है।
बढ़ती मांग के सामने कमजोर पड़ रहा नेटवर्क
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि देश में बिजली उत्पादन क्षमता तो बढ़ी है, लेकिन वितरण नेटवर्क उसी गति से मजबूत नहीं हो पाया। कई राज्यों में पुराने ट्रांसफॉर्मर, कमजोर लाइनें और ओवरलोडेड सब-स्टेशन बड़ी समस्या बन चुके हैं। निजीकरण के बाद मुनाफे वाले क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जबकि सरकारी बिजली कंपनियां आर्थिक तंगी से जूझती रहीं। इसका असर अब इंफ्रास्ट्रक्चर पर साफ दिखाई दे रहा है।
यूपी, बेंगलुरु और केरल में बढ़ीं परेशानियां
उत्तर प्रदेश में लगातार हो रही बिजली कटौती लोगों की नाराजगी का कारण बनी हुई है। वहीं बेंगलुरु के कई इलाकों में लंबे पावर कट और वोल्टेज फ्लक्चुएशन आम हो गए हैं। बिजली कंपनियां इसकी वजह मरम्मत कार्य, ट्रांसफॉर्मर ट्रिपिंग और मौसम को बता रही हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि घंटों तक बिजली गायब रहना अब रोजमर्रा की समस्या बन चुका है। केरल में भी अप्रैल के दौरान पीक ऑवर्स में बिजली कटौती करनी पड़ी। राज्य अपनी जरूरत की बड़ी मात्रा बाहर से खरीदकर पूरी करता है, क्योंकि वहां स्थानीय उत्पादन सीमित है।
तमिलनाडु में भी बढ़ा दबाव
तमिलनाडु में अप्रैल महीने में बिजली की मांग मई से ज्यादा रही। अतिरिक्त जरूरत को पूरा करने के लिए राज्य को शॉर्ट टर्म बिजली खरीदनी पड़ी। हालांकि आधिकारिक तौर पर लोड शेडिंग से इनकार किया गया, लेकिन चेन्नई समेत कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर बिजली बाधित होने की बात स्वीकार की गई।
क्या नवीकरणीय ऊर्जा भी बन रही चुनौती?
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सौर और पवन ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता भी ग्रिड प्रबंधन के लिए चुनौती बन रही है। अचानक मौसम बदलने या बादल छाने पर सोलर उत्पादन तेजी से घट जाता है, जिससे ग्रिड पर दबाव बढ़ता है।
हालांकि कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आधुनिक तकनीक और बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली के जरिए इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। जर्मनी जैसे देशों में बड़ी मात्रा में नवीकरणीय ऊर्जा इस्तेमाल होने के बावजूद बिजली व्यवस्था स्थिर बनी हुई है।
असली चुनौती सिर्फ उत्पादन नहीं, सप्लाई भी
ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में समस्या केवल बिजली पैदा करने की नहीं, बल्कि उसे हर इलाके तक बिना बाधा पहुंचाने की है। एक देश-एक ग्रिड की व्यवस्था होने के बावजूद ट्रांसमिशन नेटवर्क की सीमाएं, स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर की कमजोरी और तेजी से बढ़ती मांग आने वाले समय में और बड़ी चुनौती बन सकती है।