कृष्णावतार

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Saturday, September 28, 2013-1:08 PM

‘‘परन्तु हमारा राजा बनने योग्य है कौन?’’ एक वृद्ध यादव सामंत ने पूछा।

‘‘सर्वश्रेष्ठ श्री वसुदेव जी से ही हम यह पदवी ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करते हैं।’’ एक अन्य यादव ने कहा।

‘‘मेरा जीवन इन 25 वर्षों में सदा ही दुखमय रहा है। बड़ी बेचैनी से मैंने इतना लम्बा समय व्यतीत किया है। राज सिंहासन पर बिठाने के लिए जिसे भी तुम सब चुन लोगे उनकी मैं तन-मन से पूरी सेवा और सहायता करूंगा परन्तु मैं राजा की पदवी स्वीकार नहीं करूंगा।’’ वसुदेव जी बोले।

अनेक सामंत प्रद्यूत को संदेहपूर्ण दृष्टि से देखने लगे। वह हर प्रकार का राजकाज संभालने योग्य भले ही था परन्तु वे सामंत उसे यह पदवी सौंपने को तैयार नहीं थे। इतने में ही श्री कृष्ण जी भी वहां आ गए और अपने पिता जी के पास बैठ गए। सभी युवकों और वृद्धों ने हाथ जोड़ कर उनका स्वागत किया। अभी वह 16 वर्ष के युवा ही तो थे परन्तु उन सबका परित्राण तो उन्होंने ही किया था।
                        
‘‘बेटे, तुम कहां थे, मैं तो तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था? बल कहां है?’’ वसुदेव जी ने पूछा।

‘‘दाऊ तो मां की सेवा में हैं। मां को भवन में पहुंचा कर मैं मामा कंस के अंत्येष्टि-संस्कार का उचित प्रबंध करवाने के लिए राजभवन में चला गया था।’’

                                                                                                                                                                                       (क्रमश:)   


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