श्री राम कथा से वेश्या का हृदय हुआ राममय

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Tuesday, February 25, 2014-7:19 AM

बात उन दिनों की है जब गोस्वामी श्री तुलसीदास जी बनारस में पतितपाविनी गंगा के किनारे अस्सीघाट पर अपनी कुटिया में रहते थे। वह नित्य श्री राम कथा एवं श्री हरिनाम संकीर्तन की सरस धारा प्रवाहित करते। बहुत से भक्त अपने जीवन को कृतार्थ करने उनकी कुटिया में आते। भक्तों के जाने के पश्चात वह संकटमोचन हनुमान जी के दर्शन करने जाते। एक दिन वह दर्शन करके लौट रहे थे तो किसी के मधुर स्वर लहरी सुन कर उनके पग रूक गए। समीप से जाते एक सज्जन से उन्होंने पूछा, "भैया! यह कौन है जो मधुर गायन का जादू बिखेर रहा है।"

उत्तर मिला," बाबा! यह बसंती बाई है।"

तुलसीदास जी बोले, "कौन बसंती बाई?"

सज्जन बोले," इस नगर की मशहूर वेश्या। जिसके रूप सौंदर्य तथा गायन ने लोगों को दिवाना बना रखा है।"

जिधर से मधुर ध्वनि आ रही थी तुलसीदास जी उस ओर जाना शुरू हो गए। कुछ समय बाद ध्वनि आनी बंद हो गई। लोग बसंती बाई के घर से बाहर जाने लगे। जब सभी लोग चले गए तो तुलसीदास जी वेश्या के घर में प्रविष्ट हुए। अपने घर के अंदर किसी संत का आगमन देखकर बसंती बाई चौंक गई और बोली, "बा...बा...बाबा जी! आ..प आप।"

तुलसीदास जी बोले, "बेटी! मेरा नाम तुलसीदास है। तुम्हारी आवाज का मधुर जादू मुझे यहां खींच लाया है।"  

बसंती बाई बोली," बाबा मैं आपकी क्या सेवा करूं।"

इतना सुनते ही तुलसीदास जी का ह्रदय द्रवित हो उठा प्रेम भरे स्वर में वह बोले, "बेटी बसंती वर्षों से तुम दुनियां वालों को अपने रूप सौंदर्य एवं मंत्र मुग्ध आवाज से मोहित करती आ रही हो। एक दिन यह सब तुम से मुंह मोड़ लेंगे। बस बेटी बहुत हो चुका बस अब बस अब दुनियां के मालिक श्री राम के लिए गाओ नाचो और उन्हे रिझाओ। राम नाम के पावन जल से अपने जीवन के घट को भर लो।"

बाबा के वचन सुन कर बसंती के तन में बिजली सी कौंध गई। उसे पहला बार जीवन में किसी ने बेटी कहकर पुकारा था। बसंती की आंखों से आंसू बरसने लगे और समर्पित हो गए बाबा जी के चरणों में। बाबा उसके सीर पर प्यार भरा आशीर्वाद देकर चले गए।

अगले दिन से बसंती के कोठे पर महफिल नहीं सजी। सभी के लिए बसंती के घर के कीवाड़ बंद हो गए थे। अब बसंती बाबा जी की कुटिया में श्री राम कथा एवं श्री हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने जाने लगी। कुछ ही दिनों में उसका मन भक्ति के रंग में रंग गया। एक दिन राम कथा में अहिल्या उद्धार का प्रसंग सुनकर बसंती का मन प्रभु राम की दयालुता से सरोबार हो गया।

इस घटना के पश्चात बसंती कथा सुनने नहीं गई। बाबा को चिंता होने लगी पूछताछ करने पर पता चला कि बसंती बनारस छोड़कर कहीं चली गई है। दो महीने पश्चात राम नवमी के शुभ अवसर पर बाबा रामलला के दर्शन हेतु अयोध्या गए। सरयू में स्नान करके लौट रहे थे कि एक दर्द भरी आवाज में श्री राम का संकीर्तन सुनकर अनके पांव अवरूद्ध हो गए। बाबा के चरण उस ध्वनि की ओर बढ़ने लगे।

जिस घर से मधुर ध्वनि आ रही थी उस घर के बाहर जाकर बोले," बसंती बेटी बसंती कहां हो।"

 बसंती भागती आई बाबा बाबा बाबा आते ही उनके चरणों में गिर गई। उसके आंसूओं से उनके चरण भीग गए।

बाबा बोले," बेटी बसंती तुम यहां अयोध्या में श्री राम की सेवा में धन्य हो बेटी तुम धन्य हो.... तुम्हारा जीवन कृतार्थ हो गया...उठो उठो.... बेटी उठो...।

परंतु बसंती न उठी वह तो लीन हो चुकी थी प्रभु राम के पाद्पदमों में....। 


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