कुण्डली मिलवाने के बावजूद तलाक क्यों?

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Saturday, March 22, 2014-7:41 AM

सामाजिक मानसिक एवं दैनिक आवश्यकता है विवाह शास्त्रीय सोलह संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है विवाह। विवाह संबंध स्थापित करने से पूर्व जब वर वधू की कुंडला मिलवाई जाती है तो कैसे गुण ग्रह मिलते हैं। उस समय ज्योतिष ज्ञाता कहते हैं कि 26 गुण मिलते हैं। यह कुण्डली विष्णु लक्ष्मी जी जैसी है लेकिन कुछ ही समय के उपरांत यह विष्णु लक्ष्मी जी जैसी जोड़ी कोर्ट कचहरी के चक्कर काट रही होती है, आखिर क्यों?

जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित है उसके आधार पर कुंडली मिलान किया जाता है। जिसे आम भाषा में गुण मिलान भी कहा जाता है। इस विधि में वर एवं कन्या के नामाक्षर अथवा जन्म नक्षत्र की एक सारणी से मिलान करके परिणाम निकाला जाता है। इस गुण मिलान में त्रुटी हो जाए तो 36 में से 30  32 गुण मिलने वालों में भी तलाक की नौबत आ जाती है एवं की बार कोी भी गुम मिलने बाद बी दंपति सुकी वैवाहिक जीवन का र्निवाह करता है।

गुण मिलान से अधिक महत्वपूर्ण है वर एवं वधु की कुंडली का पंचम भाव (पंचमेश) सप्तम भाव (सप्तमेश), नवम भाग (भाग्यदेश) एवं एकादश भाव (लाभेश) की विशेष रूप से जांच करना। पंचमेश भाव में से विद्या, पद, उन्नति एवं संतान के बारे में पता लगाया जा सकता है। वर तथा कन्या की वृद्धि का स्तर लगभग समान होना चाहिए। धार्मिक प्रवृति का विश्लेषण भी सफल विवाह के लिए आवश्यक होता है।

यदि कन्या धर्मपरायण है और वर विपरित प्रवृति का है तो भी बैमनस्य उत्पन्न हो सकता है। अत दोनों की कुण्डलियों में नवम भाव बृहस्पति गृह की स्थिति और बल का अवलोकन करना बी अति आवश्यक है। विवाह के उपरांत संतान की कामना भी स्वभाविक है। बृहस्पति गृह संतान का कारक ग्रह है। यदि वर का यह पक्ष दुर्बल है तो कन्या का दुर्बल होना चाहिए। पति पत्नि के आपसी रिश्तों की मजबूरी के कारण शुक्र तथा व्ययेश ग्रह है। इस पक्ष की ग्रहण विश्लेषण की आवश्यकता आज के युग में आति महत्वपूर्ण है।

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार शुक्र ग्रह की अनुकूलता से व्यक्ति भौतिक सुख पाता है।  इसके अलावा शुक्र यौन अंगों और वीर्य का कारक भी माना जाता है। विवाह तय करने के पहले कुंडली मिलान के समय ही इन योगायोगों पर अवश्य ही दॄष्टिपात कर लेना चाहिए। यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है।

 वहीं षष्ठेश, अष्टमेश उआ द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है। काम प्रकृति की विभिन्नता के कारण असफल यौन संबंध जीवन में विषमता का कारण बन सकते हैं। इन सभी तत्वों का तात्पर्य यह है कि कुण्डली मिलान या गुण मिलान से अधिक महत्वपूर्ण है वर एवं कन्या के ग्रहों की प्रवृति का विश्लेषण करना। दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है। एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नहीं तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता।

 


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