खुदा का शुक्र है मैं मरी नहीं : मलाला

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Sunday, October 06, 2013-4:28 PM

लंदन: तालिबान के घातक हमले की शिकार हुई पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई ने जब इंगलैंड के एक अस्पताल में आंखे खोली तो उनके मन में आया सबसे पहला विचार था, ‘खुदा का शुक्र है, मैं मरी नहीं।’ संडे टाइम्स में प्रकाशित उनकी आत्मकथा के अंशों के मुताबिक, मलाला (16) ने अपनी आत्मकथा ‘आई एम मलाला: द गर्ल हू स्टुड अप फॉर एजुकेशन एंड वाज शॉट बाई दी तालिबान’ में यह बात कही है। मलाला 11 अक्तूबर को घोषित होने वाले नोबेल शांति पुरस्कार की सबसे अहम दावेदार मानी जा रही हैं।

मंगलवार को प्रकाशित होने वाली अपनी पुस्तक में मलाला ने लिखा है कि पिछले वर्ष 9 अक्तूबर को हुए हमले से जुड़ी लगभग कोई भी चीज उन्हें याद नहीं है। उन्होंने अपनी इस किताब में तालिबान के घातक हमले के बाद अस्पातल में बिताए गए अपने दिनों का विस्तृत ब्यौरा देते हुए कहा, ‘गोली लगने के एक सप्ताह बाद 16 अक्तूबर को मुझे होश आया। वहां सबसे पहले मेरे मन में विचार आया, ‘खुदा का शुक्र है, मैं मरी नहीं’।’ इस अखबार में मलाला की लिखी आत्मकथा के हवाले से बताया गया, ‘मेरे मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे: मैं कहा हूं? मुझे यहां कौन लेकर आया? मेरे माता पिता कहां हैं? क्या मेरे पिता जीवित हैं? मैं डरी हुई थी। मुझे सिर्फ यही पता था कि अल्लाह ने मुझे एक नई जिंदगी से नवाजा है।’


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