मुजफ्फरनगर में काली रही दीवाली

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Tuesday, November 05, 2013-1:32 PM

नई दिल्ली/मुजफ्फरनगर (हर्ष कुमार सिंह): एेसी दीवाली की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। पिछले दो महीने से सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलस रहे मुजफ्फरनगर जिले में इस बार दीवाली का उत्साह एक तिहाई भी नजर नहीं आया। इस इलाके की प्रमुख बिरादरी जाट समुदाय ने दीवाली को बिल्कुल नहीं मनाया। ग्रामीण इलाकों में सन्नाटा पसरा रहा। जिला मुख्यालय पर भी जाट कालोनी व अन्य मोहल्लों ने जाट बिरादरी के लोगों ने त्योहार पर किसी प्रकार की सजावट नहीं की और न ही पटाखों की धमक सुनाई दी। केवल मुजफ्फरनगर ही नहीं बल्कि बागपत, मेरठ, सहारनपुर, बिजनौर आदि जिलों से भी इसी प्रकार की खबरें मिली हैं।
 

अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह में शुरू हुए इस कुचक्र का सिलसिला अभी तक चल रहा है। अभी एक सप्ताह पहले भी बुढ़ाना क्षेत्र में हुई हिंसा के बाद तनाव ग्रामीण इलाकों में चल ही रहा है। देहात का आलम ये है कि शाम पांच बजे के बाद ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता है। देहात की ओर जाने वाले वाहन भी अपनी अंतिम सेवाएं चार बजे तक ही सीमित कर रहे हैं। सब जानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में लोगों को मुख्य मार्गों पर उतरने के बाद एक दो किमी तक कम से कम पैदल चलकर गांवों तक पहुंचना होता है। ज्यादातर संपर्क मार्ग जंगल से होकर ही जाते हैं। अब स्थिति ये है कि लोगों में भय और अविश्वास इस कदर घर चुका है कि इन सुनसान रास्तों से होकर निकलना अब लोगों ने बंद कर दिया है।

दंगों के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित रहे फुगाना, बहावड़ी, लांक, लिसाढ़ आदि इलाकों के आसपास के गांवों में तो स्थिति लगातार विस्फोटक बनी हुई है। यहां कई हत्याएं हुई थी और अल्पसंख्यक परिवारों ने पलायन कर दिया था। फुगाना गांव में लोगों ने अपने घरों के आसपास की गलियों में सुरक्षा के लिहाज से लोहे के बड़े-बड़े गेट लगवा लिए हैं। शाम होते ही उन्हें बंद कर दिया जाता और किसी अनजान आदमी के गुजरने पर भी नजर रखी जा रही है।

अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का विश्वास भी अभी तक लौटा नहीं है। लोग अभी भी शिविरों में रह रहे हैं या फिर जिन लोगों को रिश्तेदार दिल्ली या आसपास के अन्य राज्यों में हैं वे वहां शिफ्ट कर रहे हैं। इसकी वजह से ग्रामीण इलाकों में काम धंधों का संकट पैदा हो गया है। ग्रामीण इलाकों में तेली व लुहार का काम बहुतायत में मुस्लिम समुदाय के लोग ही कर रहे थे लेकिन ये लोग भी पलायन कर गए हैं और इसकी वजह से किसानों को बेहद दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पालतू पशुओं के लिए चारा काटने की मशीन में प्रयोग होने वाले गंडासों की धार लगवाने के लिए किसानों को दूसरे इलाकों में जाना पड़ रहा है।

फुगाना के किसान हरपाल सिंह ने बताया कि गंडासों को लगवाने के लिए दूर दराज के गांवों में जाना पड़ रहा है और ये कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में मिस्त्री का काम भी मुसलमान ही करते रहे हैं। मोटर ठीक कराना या इंजन की सर्विस करानी है तो आपको मुस्लिम कारीगरों पर ही निर्भर रहना होगा। अब ये लोग पलायन कर गए हैं। ये काम भी एेसे हैं जिन्हें कहीं भी जमाया जा सकता है।
 

चौधरी सुरेश सिंह ने बताया कि अब देहात में मुस्लिम परिवार वहीं हैं जहां पर उनकी आबादी ज्यादा है। इसके अलावा पलायन के बारे में एेसे लोगों ने नहीं सोचा है जिनके जमीनों से जुड़े कारोबार हैं। अन्यथा जिन लोगों के पास हाथ का हुनर है वे यहां से निकलकर दूसरे इलाकों में अपना वजूद तलाश रहे हैं और वहां स्थापित होने का प्रयास कर रहे हैं।

 

Edited by:Jeta

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