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सोशल मीडिया पर लगाम मुश्किल

  • सोशल मीडिया पर लगाम मुश्किल
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Tuesday, April 01, 2014-2:25 PM
नई दिल्ली  (कार्तिकेय हरबोला): सोशल मीडिया पर इन दिनों चुनाव में उतरे प्रत्याशियों के समर्थन व विरोध में जंग शुरू हो चुकी है। कोई किसी पार्टी की तो कोई किसी पार्टी के प्रत्याशी का समर्थन कर रहा है। अलग-अलग गु्रप में समर्थक अपने-अपने नेताओं व पार्टी के समर्थन में पोस्ट डाल रहे हैं। कई पोस्ट तो आचार संहिता के दायरे की हदें पार कर रहीं हैं। सोशल मीडिया में प्रचार पर निगरानी और रोक को लेकर चुनाव आयोग के पास तंत्र न होने ेसे प्रत्याशी खूब फायदा उठा रहे हैं।
 
सोशल मीडिया के तहत फेसबुक, ट्विटर, लिंक्ड-इन आदि के अलावा राजनीतिक पार्टियों ने अपनी वैबसाइट भी बना रखी है। कुछ तो फर्जी एकाउंट चला रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग इसे लेकर असहाय है। चुनाव अधिकारियों कि मानें  तो आयोग के पास ऐसा तंत्र ही नहीं है कि ऐसे मामलों पर कार्रवाई तो दूर, पूरी तरह से नजर रखी जा सके।

आयोग रख रहा है नजर
चुनाव आयोग ने पहली बार व्यवस्था  की है कि प्रत्याशी को नामांकन के समय अपनी पार्टी की चलाई जाने वाली अधिकृत सोशल साइट या इस्तेमाल में लाई जा रही अन्य किसी साइट के बारे में भी जानकारी देनी होगी। बावजूद यह कदम कारगर नहीं हो रहा। हालांकि चुनाव अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि हमारे पास सोशल मीडिया के प्रचार के लिए इस्तेमाल या अन्य किसी प्रकार की शिकायत आती है तो हम जरूर कार्रवाई करेंगे।
 
रोक के खिलाफ लोग
युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दल सोशल मीडिया का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। कई प्रत्याशियों ने बकायदा अपने खाते खोले हैं। इस पर रोक पर अनेक बुद्धिजीवी  इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश मानकर चल रहे हैं, लिहाजा इस बाबत बहस तेज हो गई है और इस मीडिया को आदर्श आचार संहिता से बाहर रखने की पैरवी की जा रही है।

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