गठबंधन राजनीति की अनिश्चितता में फिर प्रवेश कर रहा भारत

Edited By ,Updated: 09 Jun, 2024 05:02 AM

india is re entering the uncertainty of coalition politics

मुझे लोकसभा चुनाव के नतीजों पर विचार करने में कुछ समय लगा। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने पिछले दशक में केंद्र और कई राज्यों में कम से कम एक दर्जन चुनावों की देखरेख की है। मैं भी कई अन्य लोगों की तरह परिणामों से चकित था।

मुझे लोकसभा चुनाव के नतीजों पर विचार करने में कुछ समय लगा। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने पिछले दशक में केंद्र और कई राज्यों में कम से कम एक दर्जन चुनावों की देखरेख की है। मैं भी कई अन्य लोगों की तरह परिणामों से चकित था। लेकिन जैसे-जैसे प्रचार और उन्माद शांत होता जा रहा था जनादेश के विभिन्न पहलू स्पष्ट रूप से सामने आ रहे थे। 

भाजपा समर्थकों के लिए यह राहत और आश्वासन की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार दोबारा सत्ता में लौट रही है। हालांकि संख्यात्मक रूप से कम होने के बावजूद भाजपा किसी भी अन्य व्यवस्था की तुलना में स्थिर सरकार प्रदान करने में सक्षम एकमात्र पार्टी बनकर उभरी। पूर्व और दक्षिण में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। केरल में पार्टी ने अपनी पहली संसदीय सीट जीती और उसका वोट शेयर 2019 के मुकाबले 2024 में 3 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 16 प्रतिशत हो गया। तेलंगाना में इसकी सीटें दोगुनी हो गईं, जबकि वोट शेयर 19 प्रतिशत से बढ़कर प्रभावशाली 35 प्रतिशत हो गया। तमिलनाडु में हालांकि पार्टी कोई भी सीट जीतने में विफल रही लेकिन उसका वोट शेयर 3 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 12 प्रतिशत हो गया। पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ओडिशा विधानसभा चुनाव में जीत और राज्य में पहली बार भाजपा सरकार का गठन था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात में भी पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा है। 

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि सत्तारूढ़ दल को सबसे बड़ा झटका और शॄमदगी उत्तर प्रदेश से मिली, एक ऐसा राज्य जहां से उसे बहुत उम्मीदें थीं। उस स्थिति में परिणाम गंभीर आत्मनिरीक्षण की मांग करते हैं। केंद्र और  राज्य में लोकप्रिय सरकारों और अयोध्या और काशी में इतने अच्छे काम और बदलाव  के बावजूद, भाजपा अपनी लगभग आधी सीटें हार गई। हालांकि गंभीर आत्ममंथन आवश्यक है, लेकिन अपमानजनक अपमान अनावश्यक है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान और बंगाल में भी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चे की 6 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल कर वापसी भी एक वजह हो सकती है। हालांकि इन और अन्य राज्यों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए अधिक जटिल कारण प्रतीत होते हैं। 

बहुतों को उम्मीद नहीं थी कि ‘इंडिया’ गठबंधन इतना अच्छा प्रदर्शन करेगा। लेकिन अंत में घटक दलों, विशेष रूप से कई राज्यों में कांग्रेस, और सपा, टी.एम.सी., द्रमुक, राकांपा-एस.पी., शिवसेना-यू.बी.टी. और अन्य ने अपने-अपने राज्यों में सराहनीय लाभ कमाया, जिससे गठबंधन की संख्या 230 से ऊपर हो गई। देश की लगभग आधी सीटों पर चुनाव लड़ते हुए कांग्रेस पार्टी अपना वोट शेयर लगभग 1.5 प्रतिशत बढ़ाने में सफल रही। देश के नजरिए से इन नतीजों का मिला-जुला संदेश है। चुनाव प्रचार के दौरान एक समाचार चैनल से बात करते हुए पी.एम. मोदी ने कहा कि वह ‘2014 से 2024 तक एक मजबूत विपक्ष’ से चूक गए। उन्होंने टिप्पणी की, ‘अगर मेरे जीवन में किसी चीज की कमी है, तो वह अच्छे विपक्ष की कमी है।’ एक मजबूत विपक्ष की संभावना दिख रही है लेकिन केवल अनुभव ही बता सकता है कि क्या यह ‘अच्छा विपक्ष’ होगा? सदन में संख्यात्मक रूप से बड़े विपक्ष के साथ राजकोष पक्ष को बेहतर प्रबंधकों की आवश्यकता हो सकती है जो सदन के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए सहजता से गलियारे में घूम सकें। 

दुख की बात है कि एक दशक की स्थिरता और पूर्वानुमानित राजनीति के बाद देश गठबंधन राजनीति की अनिश्चितता में फिर से प्रवेश कर रहा है। हालांकि पिछले 10 वर्षों में देश को एन.डी.ए. गठबंधन द्वारा चलाया गया था, लेकिन सत्तारूढ़ दल को अपने दम पर पूर्ण बहुमत प्राप्त था। भाजपा के 240 सीटों पर सिमटने से मौजूदा एन.डी.ए. गठबंधन पहले से अलग होगा। आशा की किरण यह है कि 1999-2004 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के विपरीत  जिसमें 182 भाजपा सदस्य थे और अन्य दलों के 115 सदस्यों पर निर्भर थे, यह वर्तमान एन.डी.ए. गठबंधन के अंकगणित में बेहतर स्थिति में है। इसके अलावा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मोदी सरकार द्वारा चलाया जा रहा महत्वपूर्ण सुधार एजैंडा अधिक दलों को उनका समर्थन करने के लिए आगे आने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे सरकार को अधिक स्थिरता मिलेगी। 

इस चुनाव में सामने आई एक और गंभीर चुनौती अलगाववादी विचारधारा के प्रति निष्ठा रखने वाले कम से कम 3 स्वतंत्र उम्मीदवारों की जीत थी। उनमें से 2 अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा, पंजाब से जीते, जबकि तीसरे, अब्दुल राशिद शेख, उर्फ इंजीनियर राशिद, जम्मू-कश्मीर से चुने गए। आखिरी बार ऐसी अलगाववादी आवाज 1999 में भारतीय संसद में प्रवेश कर सकी थी जब सिमरनजीत सिंह मान ने पंजाब के संगरूर से चुनाव जीता था। पिछले 2 दशकों में अब तक ऐसी आवाजें राज्य विधानसभाओं तक ही सीमित थीं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एन.डी.ए. की तीसरी बार जीत एक संसदीय रिकॉर्ड होगी। हालांकि, स्थिति दोनों पक्षों की ओर से अधिक समायोजन और जिम्मेदार राजनीति की मांग करती है। महात्मा गांधी को कई बातों के लिए याद किया जाता है। लेकिन वह स्वतंत्रता-पूर्व युग में गठबंधन की राजनीति शुरू करने वाले पहले व्यक्ति थे। उनकी सफलता विनम्रता और शिष्टता में निहित है, ऐसे गुण जिनकी भारतीय राजनीति को सख्त जरूरत है।-राम माधव (लेखक, इंडिया फाऊंडेशन के अध्यक्ष और आर.एस.एस. से जुड़े हैं) 
                 

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