गैर-जिम्मेदाराना भाषा के लिए भारतीय लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं

Edited By ,Updated: 27 Mar, 2023 03:41 AM

indian democracy has no place for irresponsible language

राहुल गांधी के ताजा विवाद पर पक्ष और विपक्ष तलवारें भांजे आमने-सामने खड़े हैं। इस विवाद के कानूनी व राजनीतिक पक्षों पर मीडिया में काफी बहस चल रही है। इसलिए उसकी पुनरावृत्ति यहां करने की आवश्यकता नहीं है। पर इस विवाद के बीच जो विषय ज्यादा गंभीर है उस...

राहुल गांधी के ताजा विवाद पर पक्ष और विपक्ष तलवारें भांजे आमने-सामने खड़े हैं। इस विवाद के कानूनी व राजनीतिक पक्षों पर मीडिया में काफी बहस चल रही है। इसलिए उसकी पुनरावृत्ति यहां करने की आवश्यकता नहीं है। पर इस विवाद के बीच जो विषय ज्यादा गंभीर है उस पर देशवासियों को मंथन करने की जरूरत है। चुनाव के दौरान पक्ष और प्रतिपक्ष के नेता सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर अनेक आरोप लगाते हैं और उनके समर्थन में अपने पास तमाम सबूत होने का दावा भी करते हैं। 

चुनाव समाप्त होते ही यह खूनी रंजिश प्रेम और सौहार्द में बदल जाती है। न तो वे प्रमाण कभी सामने आते हैं और न ही जनसभाओं में उछाले गए घोटालों को तार्किक परिणाम तक ले जाने का कोई गंभीर प्रयास सत्ता पर काबिज हुए नेताओं द्वारा किया जाता है। कुल मिलाकर यह सारा तमाशा मतदान के आखिरी दिन तक ही चर्चा में रहता है और फिर अगले चुनावों तक भुला दिया जाता है। 

हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता का यह एक उदाहरण है जो हम आजादी के बाद से आज तक देखते आए हैं। हालांकि चुनावों में धन तंत्र, बल तंत्र व ङ्क्षहसा आदि के बढ़ते प्रयोग ने लोकतंत्र की अच्छाइयों को काफी हद तक दबा दिया है। पिछले चार दशकों में लोकतंत्र को पटरी पर लाने के अनेक प्रयास हुए पर उसमें विशेष सफलता नहीं मिली। फिर भी हम आपातकाल के 18 महीनों को छोड़ कर कमोबेश एक संतुलित राजनीतिक माहौल में जी रहे थे। 

दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में राजनीति की भाषा में बहुत तेजी से गिरावट आई है और इस गिरावट का सूत्रपात सत्तापक्ष के दल और संगठनों की ओर से हुआ है। ‘ट्रोल आर्मी’ एक नया शब्द अब राजनीतिक पटल पर हावी हो गया है। किसी भी व्यक्ति को उसके पद, योग्यता, प्रतिष्ठा, समाज और राष्ट्र के लिए किए गए योगदान आदि की उपेक्षा करके ये ‘ट्रोल आर्मी’ उस पर किसी भी सीमा तक जा कर अभद्र टिप्पणी करती है। माना जाता है कि हर क्रिया की विपरीत और समान प्रक्रिया होती है। 

परिणामत: अपने सीमित संसाधनों के बावजूद विपक्षी दलों ने भी अपनी-अपनी ‘ट्रोल आर्मी’  खड़ी कर ली है। कुल मिलाकर राजनीतिक वातावरण शालीनता के निम्नतर स्तर पर पहुंच गया है। हर वक्त चारों ओर उत्तेजना का वातावरण पैदा हो गया है जो राष्ट्र के लिए बहुत अशुभ लक्षण है। इससे नागरिकों की ऊर्जा रचनात्मक व सकारात्मक दिशा में लगने की बजाय विनाश की दिशा में लग रही है। पर लगता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व को इस पतन की कोई चिंता नहीं है। 

जिस आरोप पर सूरत की अदालत ने राहुल गांधी को इतनी कड़ी सजा सुनाई है उससे कहीं ज्यादा आपराधिक भाषा का प्रयोग पिछले कुछ वर्षों में सत्ताधीशों के द्वारा सार्वजनिक मंचों पर बार-बार किया गया है। मसलन किसी भद्र महिला को ‘जर्सी गाय’ कहना, किसी राज्य की मुख्यमंत्री को उस राज्य के हिजड़ों की भाषा में संबोधन करना, किसी बड़े राजनेता की महिला मित्र को ‘50 करोड़ की गर्ल फ्रैंड’ बताना, किसी बड़े राष्ट्रीय दल के नेता का बार-बार उपहास करना और उसे समाज में मूर्ख सिद्ध करने के लिए अभियान चलाना, किसी महिला सांसद का सांकेतिक भाषा में सूर्पनखा कह कर मजाक उड़ाना। ये कुछ उदाहरण हैं यह सिद्ध करने के लिए कि ऊंचे पदों पर बैठे लोग सामान्य शिष्टाचार भी भूल चुके हैं। 

यहां 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय की एक घटना का उल्लेख करना उचित होगा। जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत के संदर्भ में घोषणा की थी कि वे भारत से एक हजार साल तक लड़ेंगे। इस पर भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने रामलीला मैदान की एक विशाल जनसभा में बिना पाकिस्तान या भुट्टो का नाम लिए बड़ी शालीनता से यह कहते हुए जवाब दिया कि, ‘‘वे कहते हैं कि हम एक हजार साल तक लड़ेंगे, हम कहते हैं कि हम शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से रहेंगे।’’ 

ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब भारत के प्रधानमंत्रियों ने अपने ऊपर तमाम तरह के आरोपों और हमलों को सहते हुए भी अपने पद की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। चाहे वे किसी भी दल से क्यों न आए हों क्योंकि प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है, किसी दल विशेष का नहीं।इस मर्यादा को पुन: स्थापित करने की आवश्यकता है। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।(3.21)’ अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं। 

इस संदर्भ में सबसे ताजा उदाहरण जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा का है जिन्होंने पिछले हफ्ते ग्वालियर के एक शैक्षिक संस्थान में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि, ‘‘गांधी जी के पास कोई लॉ की डिग्री नहीं थी। क्या आप जानते हैं कि उनके पास एक भी यूनिवर्सिटी की डिग्री नहीं थी। उनकी एकमात्र योग्यता हाई स्कूल डिप्लोमा थी।’’ बी.एच.यू. वाराणसी के इंजीनियरिंग ग्रैजुएट का गूगल युग में ऐसा अहमक बयान किसके गले उतरेगा? जबकि सारा विश्व जानता है कि गांधी जी कितने पढ़े-लिखे थे और उनके पास कितनी डिग्रियां थीं? 

सिन्हा के इस वक्तव्य से करोड़ों देशवासियों की भावनाएं आहत हुई हैं। क्या देश भर की अदालतों में  सिन्हा के खिलाफ  मानहानि के मुकद्दमे दायर किए जाएं या राष्ट्रपति महोदया से, अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए, उन्हें पद मुक्त किए जाने की अपील की जाए? जब शासन व्यवस्था में सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों की भाषा में इतना हल्कापन आ चुका हो तो यह पूरे देश के लिए खतरे की घंटी है। इसे दूर करने के लिए बिना राग द्वेष के समाज के हर वर्ग और राजनीतिक दलों के नेताओं को सामूहिक निर्णय लेना चाहिए कि ऐसी गैर-जिम्मेदाराना भाषा के लिए भारतीय लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं।-विनीत नारायण    
 

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