Edited By Niyati Bhandari,Updated: 08 Oct, 2026 11:46 AM

Shardiya Navratri 2026 Kanya Pujan Rules: शारदीय नवरात्रि 2026 में कन्या पूजन के दौरान कितनी कन्याओं को भोजन कराना शुभ होता है? जानें 2, 5, 7 या 9 कन्याओं के पूजन का धार्मिक महत्व, सही उम्र और संपूर्ण पूजा विधि।
Shardiya Navratri 2026 Kanya Pujan Rules: नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान मां दुर्गा की उपासना के साथ ही कन्या पूजन की परंपरा का विशेष महत्व माना गया है। महाअष्टमी और महानवमी तिथि पर छोटी कन्याओं को साक्षात देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है और उन्हें आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ 11 अक्टूबर (रविवार) से हो रहा है, जिसका समापन 19 अक्टूबर 2026 को होगा। कन्या पूजन को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में यह संशय रहता है कि पूजा के लिए कितनी कन्याओं को आमंत्रित करना सबसे शुभ होता है और क्या 9 से कम कन्याओं को जिमाने से भी पूजा पूर्ण मानी जाती है।

क्या 9 कन्याएं ही जरूरी हैं या 2, 5, 7 भी हैं शुभ?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार कन्या पूजन के लिए 9 कन्याओं को भोजन कराना सबसे प्रमुख और उत्तम माना जाता है, क्योंकि ये नौ कन्याएं मां नवदुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक होती हैं। हालांकि, यदि किसी कारणवश एक साथ 9 कन्याएं उपलब्ध न हो सकें, तो पूजा को अधूरा मानने या चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। परंपरा के अनुसार अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव से 2, 3, 5, 7 या फिर 1 कन्या का पूजन करके भी उन्हें भोजन कराया जा सकता है।
लांगुरिया (भैरव) का पूजन भी है आवश्यक
कन्या पूजन के दौरान नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी भोजन कराने का नियम है। इस बालक को लांगुरिया या भैरव देव का प्रतीक माना जाता है।
हर उम्र का अलग रूप
शक्ति के आराधकों के लिए इस दिन कन्याएं साक्षात मां दुर्गा के समान होती हैं। इनकी आराधना करने से मां प्रसन्न होती हैं और मनोकामना पूर्ण करती हैं। नवरात्र में दो वर्ष से नौ वर्ष तक की ही कन्याओं का पूजन किया जाना शुभ माना जाता है। शास्त्रों में दो वर्ष की कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्त, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छह वर्ष की कालिका, सात वर्ष की शांभवी एवं आठ वर्ष की कन्या को सुभद्रा बताया गया है। ये देवी के वे रूप हैं जिनकी आराधना मात्र से व्यक्ति के सारे क्लेश कट जाते हैं और व्यक्ति परम सुखी हो सत्कामी हो जाता है।
अष्टमी और नवमी नवदुर्गा को सबसे अधिक प्रिय हैं क्योंकि इन दोनों तिथियों को कन्या पूजन किया जाता है साथ ही महागौरी और सिद्धिदात्री देवी की पूजा करने के बाद हवन करने का विधान है। इस दिन बहुत सारे भक्त अपनी कुल देवी की उपासना भी करते हैं।
नवरात्र के दौरान आठवें अथवा नौवें दिन सुबह के समय कन्या पूजन किया जाता है। माना जाता है कि आहुति, उपहार, भेंट, पूजा-पाठ और दान से मां दुर्गा इतनी खुश नहीं होतीं, जितनी कंजक पूजन और लोंगड़ा पूजन से होती हैं। अपने भक्तों को सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करती हैं। कन्या पूजन के लिए जिन कन्याओं को अपने घर आमंत्रित करें उनकी उम्र दो वर्ष से कम और नौ वर्ष से अधिक न हो क्योंकि इसी उम्र की कन्याओं को मां दुर्गा का रूप माना गया है। कन्याओं के साथ एक लोंगड़ा यानी लड़के को भी जिमाते हैं। माना जाता है कि लोंगड़े के अभाव में कन्या पूजन पूर्ण नहीं होता।
अष्टमी को जरूरी कन्या पूजन
नवरात्र में अगर उम्र के हिसाब से कन्याएं मिलें तो हर दिन उनके पूजन का विधान है अन्यथा अष्टमी के दिन कन्याओं को आसन पर बैठा कर मां भगवती के नामों से पृथक-पृथक उनकी पूजा करनी चाहिए। कन्याओं के पूजन और उनकी आरती उतारने के बाद उनको भोजन कराते हुए वस्त्र आदि भेंट कर उन्हें विदा करना चाहिए। नवरात्र में किया गया पूजा-पाठ एवं आराधना कभी निष्फल नहीं होती अपितु श्रद्धालुओं को उसका फल निश्चित रूप से मिलता है।
