Story of Holi- कैसे हुआ होली मनाने का आरंभ, पढ़ें पौराणिक कथाएं

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 16 Mar, 2024 07:47 AM

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जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर मानवीय मूल्यों तथा आपसी संबंधों की मधुरता को भूल अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। होली पर्व मानवीय रिश्तों में ताजगी लेकर आता है। आध्यात्मिक, पौराणिक तथा पारंपरिक गुणों के माधुर्य से सुसज्जित यह सभी को आनंद प्रदान करने...

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The Legend of Holi- जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर मानवीय मूल्यों तथा आपसी संबंधों की मधुरता को भूल अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। होली पर्व मानवीय रिश्तों में ताजगी लेकर आता है। आध्यात्मिक, पौराणिक तथा पारंपरिक गुणों के माधुर्य से सुसज्जित यह सभी को आनंद प्रदान करने वाला त्यौहार है। 

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कामदेव को जीवनदान और पूतना वध
इसी दिन भगवान शिव की क्रोधाग्नि से भस्म हुए कामदेव को पुन: भगवान शिव ने जीवनदान दिया था। जिस दिन भगवान श्री कृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध कर उसे मुक्ति प्रदान की थी वह दिन फाल्गुन मास की पूर्णिमा का था अर्थात उस दिन होली पर्व था। 

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मथुरा-वृंदावन की छटा निराली
मथुरा-वृन्दावन में तो होली की अद्भुत छटा देखते ही बनती है।  टेसू के फूल तोड़कर और उन्हें सुखा कर रंग और गुलाल बनाया जाता है। फाल्गुन के माह ‘रंगभरनी एकादशी’ से सभी मंदिरों में फाग उत्सव प्रारंभ होते हैं। 

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आरंभ बरसाना से
होली का आरंभ फाल्गुन शुक्ल नवमी बरसाना से होता है। वहां की ‘लठ्ठमार होली’ विश्व प्रसिद्ध है। भगवान श्री राधा कृष्ण जी की भक्ति में रंगे भक्त-जन बड़े ही भक्ति भाव और श्रद्धा से होली पर्व में सम्मिलित होने पूरे भारत से वृंदावन की भूमि पर एकत्रित होते हैं। 

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राग और रंग का पर्व
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुंचाने वाली प्रकृति का यौवन भी चरम अवस्था पर होता है। फाल्गुन माह में मनाए जाने से इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। 

सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह रंग प्रेमियों की टोलियां रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंग कर एक-सा बन जाता है।

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भक्तिकालीन काव्य में होली
भक्तिकाल और रीतिकाल में होली, फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन कवियों सूरदास, मीरा, कबीर और रीतिकालीन बिहारी,  केशव, घनानंद आदि सभी कवियों का यह प्रिय विषय रहा है। 

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चाहे वह सगुन साकार भक्तिमय प्रेम हो या निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम हो, फाल्गुन माह का फाग भरा रस सबको छूकर गुजरा है। होली के रंगों के साथ-साथ प्रेम के रंग में रंग जाने की चाह ईश्वर को भी है तो भक्त को भी है।

मीरा बाई ने कहा है :
रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी री।।
उड़त गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकां उडावां रंग रंग री झरी, री।।
चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरां दासी गिरधर नागर,
चेरी चरण धरी री।।

इस पद में मीरा ने होली के पर्व पर अपने प्रियतम कृष्ण को अनुराग भरे रंगों की पिचकारियों से रंग दिया है। मीरा अपनी सखी को संबोधित करते हुए कहती हैं :
मैंने अपने प्रियतम कृष्ण के साथ रंग से भरी, प्रेम के रंगों से सराबोर होली खेली। होली पर इतना गुलाल उड़ा कि जिसके कारण बादलों का रंग भी लाल हो गया। 

मीरा कहती हैं कि अपने प्रिय से होली खेलने के लिए मैंने मटकी में चन्दन, अरगजा, केसर आदि भर कर रखे हुए हैं। मैं तो उन्हीं गिरधर नागर की दासी हूं और उन्हीं के चरणों में मेरा सर्वस्व समर्पित है।

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सूर के कान्हा की होली
सूर के कान्हा की होली देख तो देवतागण तक अपना कौतुहल न रोक सके और आकाश से निरख रहे हैं कि आज कृष्ण के साथ ग्वाल बाल और सखियां फाग खेल रहे हैं। फाग के रंगों के बहाने ही गोपियां मानो अपने हृदय का अनुराग प्रकट कर रही हैं, मानो रंग-रंग नहीं उनका अनुराग ही रंग बन गया है। सभी गोपियां सुन्दर परिधान पहन कर अपनी आंखों में काजल लगाकर कृष्ण की पुकार पर सज संवर कर अपने घरों से निकल पड़ीं और होली खेलने के लिए आ खड़ी हुई हैं।

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पवित्रता और गरिमा बनाए रखें
होली के रंगों में देश की एकता और अखंडता की भावना है। यह रंगोत्सव पर्व बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति का माध्यम है। क्षमाशीलता, भक्ति-रस, राग-रंग, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकता का त्यौहार यह होली पर्व युगों-युगों से भारतीय सनातन संस्कृति को एक विशिष्ट पहचान प्रदान किए हुए है, जिसे मर्यादित ढंग से मना कर हमें आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है। 

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