रणदीप हुड्डा ने पोर्ट ब्लेयर में मनाई वीर सावरकर की 141वीं जयंती

Updated: 29 May, 2024 03:45 PM

randeep hooda celebrated 141st birth anniversary of veer savarkar in port blair

वीर सावरकर की 141वीं जयंती और ZEE5 पर फिल्म के वर्ल्ड डिजिटल प्रीमियर से पहले रणदीप हुड्डा पोर्ट ब्लेयर भी गए। दरअसल इस शहर का सावरकर की ज़िंदगी से बहुत गहरा नाता है।

नई दिल्ली। हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ की कामयाबी के बाद रणदीप हुड्डा का उत्साह सातवें आसमान पर है, जिसे देश के महान स्वतंत्रता सेनानी की 141वीं जयंती के अवसर पर ZEE5 पर रिलीज़ किया गया है। लेकिन इसकी वजह क्या है? इसकी वजह ये है कि, हाल ही में दादर के स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक में एक समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें बिहार के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर और विनायक दामोदर सावरकर के परिवार के करीबी सदस्य, रंजीत सावरकर की मौजूदगी में अभिनेता को ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। क्रांतिकारी नेता की ज़िंदगी को सच्चाई, ईमानदारी और बड़ी संजीदगी से पर्दे पर उतारने की उनकी कोशिशों और सच्ची लगन के लिए रणदीप को यह पुरस्कार दिया गया।


इसके अलावा, वीर सावरकर की 141वीं जयंती और ZEE5 पर फिल्म के वर्ल्ड डिजिटल प्रीमियर से पहले रणदीप हुड्डा पोर्ट ब्लेयर भी गए। दरअसल इस शहर का सावरकर की ज़िंदगी से बहुत गहरा नाता है। इस दौरान रणदीप आईकॉनिक सेल्यूलर जेल भी पहुँचे, जहाँ क्रांतिकारी नेता को आजीवन कारावास यानी कुल पचास साल की कैद की सज़ा सुनाई गई थी। यहाँ उन्होंने जेल के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ केक काटकर सावरकर की ज़िंदगी और उनकी विरासत का जश्न मनाया। 


रणदीप के लिए यह पुरानी यादों को ताज़ा करने वाला सफ़र था, क्योंकि वे इससे पहले भी फिल्म के कुछ अहम दृश्यों की शूटिंग के लिए सेल्यूलर जेल जा चुके थे। रणदीप रॉस आइलैंड भी गए, जहाँ सावरकर को गोली मारी गई थी, साथ ही वे फ्लैग प्वाइंट भी गए, जहाँ 30 दिसंबर, 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार देश की धरती पर भारत का झंडा फहराया था। ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग के साथ वीर सावरकर की ज़िंदगी और उनकी विरासत के जश्न का सिलसिला जारी रहा, जिसका आयोजन अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के माननीय उपराज्यपाल की ओर से किया गया था और इसमें रणदीप हुड्डा अपनी पत्नी के साथ शामिल हुए।


इस मौके पर रणदीप हुड्डा ने कहा, "सेल्यूलर जेल का इतिहास बड़ा ही ख़ौफ़नाक रहा है और इस जगह पर खड़ा होना मेरे लिए बड़े गौरव की बात है, क्योंकि यही वह जगह है जहाँ वीर सावरकर ने अपार कष्ट सहते हुए भारत की आजादी के अपने संकल्प में रत्ती भर भी कमी नहीं आने दी। उनकी कहानी बुलंद हौसले और देशभक्ति की ताकत की जीती-जागती मिसाल है। आज सावरकर की 141वीं जयंती है और आज ही के दिन ZEE5 पर फिल्म स्वातंत्र्य वीर सावरकर का वर्ल्ड डिजिटल प्रीमियर भी होने वाला है। हम इस फिल्म के ज़रिये उनकी ज़िंदगी के असाधारण सफ़र को सबसे सामने लाना और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करना चाहते हैं। मैं अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के माननीय उपराज्यपाल का शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने हमारे नायक की जयंती मनाने के लिए मुझे उस जगह पर आमंत्रित किया, जहाँ उन्होंने हमारे देश की आज़ादी के लिए बहुत कष्ट सहे। मुझे खुशी है कि काला पानी में होने वाले ज़ुल्मों की कहानी को फिल्म के ज़रिये दिखाने और अपना खून, पसीना और आँसू बहाते हुए पूरी ईमानदारी के साथ स्वातंत्र्य वीर सावरकर को बनाने में की गई मेरी कोशिश रंग लाई है, क्योंकि दुनिया भर के फैन्स इस फिल्म को पसंद कर रहे हैं और इसकी तारीफ कर रहे हैं।”

 

वीर सावरकर ब्रिटिश शासन से पूरी आज़ादी पाने के पक्के हिमायती थे और क्रांतिकारी आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले इंसान थे। वीर सावरकर गुलामी के दौर की जेल में एक दशक से अधिक समय तक रहे, जिसे काला पानी भी कहा जाता है। इस दौरान उन्होंने अपने साथी कैदियों के दिलों में आज़ादी का उत्साह जगाया और अपनी किताबों के ज़रिये आज़ादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया। सेल्यूलर जेल में बिताए गए समय ने उनके संकल्प को और मजबूत किया। हिंदुत्व पर उनकी प्रभावशाली रचनाओं के साथ-साथ उनकी किताबें आज भी भारतीय राजनीतिक विचार पर गहरा असर डालती हैं। 

 

'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' भारत के अब तक के सबसे दिलेर क्रांतिकारी, विनायक दामोदर सावरकर के जीवन की सच्ची घटनाओं पर आधारित ड्रामा फ़िल्म है, जिसमें उनकी ज़िंदगी के सफ़र को बखूबी दिखाया गया है। वे आज़ादी की लड़ाई में अहम योगदान देने वाले भारत के सबसे प्रभावशाली लेकिन विवादित व्यक्तित्वों में से एक हैं, और सामान्य तौर पर अभी तक उनके बारे में बहुत कम लिखा गया है या लोगों को काफी कम जानकारी है। दरअसल 'हिंदुत्व' और 'अखंड भारत' का विचार सबसे पहले उन्होंने ही दिया था, साथ ही वे नेताजी, भगत सिंह और खुदी राम बोस जैसे महान नायकों और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रेरणा स्रोत थे। फ़िल्म सावरकर की कहानी पूरी तरह से उनके नज़रिये से बयां करती है, और बेधड़क होकर उनके आदर्शों और मान्यताओं को सामने लाती है, जो शुरुआत में विवादास्पद होने के बावजूद अंत में आधुनिक भारत के ताने-बाने का हिस्सा बन गए।

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