शुक्रगुजार हूं कि इतने साल बाद भी काम मिल रहा है, वो भी पसंद का : मनोज बाजपेयी

Edited By Varsha Yadav,Updated: 16 Apr, 2024 06:21 PM

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फिल्म के बारे में निर्देशक अबान भरूचा देवहंस, मनोज बाजपेयी और प्राची देसाई ने पंजाब केसरी/ नवोदय टाइम्स/ जगबाणी/ हिंद समाचार से खास बातचीत की।

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। मनोज बाजपेयी की सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म 'साइलेंस 2: द नाईट आउल बार शूटआऊट' रिलीज हो चुकी है। फिल्म में एक्शन और रोमांच के साथ मनोज बाजपेयी ने अपनी दमदार डायलॉग डिलीवरी से चार चांद लगाए हैं। वहीं, प्राची देसाई भी पुलिस अधिकारी के किरदार में काफी जच रही हैं। फिल्म के पहले हिस्से को भी दर्शकों ने काफी ज्यादा पसंद किया था। फिल्म के बारे में निर्देशक अबान भरूचा देवहंस, मनोज बाजपेयी और प्राची देसाई ने पंजाब केसरी/ नवोदय टाइम्स/ जगबाणी/ हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...


मनोज बाजपेयी

Q.  ‘साइलैंस’ के बाद दर्शक इसके दूसरे हिस्से से क्या उम्मीद कर सकते हैं?
बड़ा है, बेहतर है। पहले कत्ल एक था, अब कई कत्ल हैं। खूनी वहां पर एक था, अब कई होने वाले हैं। ‘साइलैंस’ देखने के बाद लोगों ने ऐसा सोचा था कि आदमी बनना है तो ए.सी.पी. अविनाश जैसा बनना है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि इसके दूसरे हिस्से को भी दर्शक काफी पसंद करें।


 
Q.  ये आपकी 100वीं फिल्म है। कितना मुश्किल है अलग-अलग किरदारों के साथ फिल्म जगत में बने रहना?
अलग-अलग किरदारों को जीने की मुझमें लत है और मैं इसके साथ बिल्कुल भी त्याग नहीं करना चाहता था। ओ.टी.टी. ने मुझे वो जगह दी, जो मैं चाहता था। मुझे अपने काम को चुनने का अधिकार मिला क्योंकि इस मंच के लिए कई कहानियां लिखी जा रही थीं। अब मेरा हाथ में था उन्हें चुनना। 'सत्या' के बाद भी मेरे पास ऐसी बहुत-सी फिल्में थीं। जिन्होंने 'सत्या' देखी, उन्होंने मुझे देखा कि अब इसका क्या करें, ये ना हीरो है ना विलेन।
उस समय भी मुझे पता था कि मुझे क्या करना है इसलिए मैं उस दौरान मना करता रहा। एक वक्त आया जब मुझे अपने फ्लैट के किराए के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। इस स्थिति में सब्र बहुत काम आता है। या यूं कहूं कि सब्र ही सफलता की चाबी है। अगर दुनिया ने एक बार आपको अच्छा काम करते हुए देख लिया है, तो आपका वक्त बदलता ही है। हर साल एक-एक फिल्म करता था। 'शूल' के बाद फिर वही स्थिति हो गई। लोग मुझे आकर सलाह देते थे कि कर लो। ऐसे घर से बैठने से नहीं होगा। सारी फिल्म ‘सत्या’ या ‘शूल’ नहीं होंगी। मैं इन बातों का बुरा नहीं मानता था हालांकि लगता जरूर है। लेकिन फिर भी आपको अपने रास्ते के लिए फोकस रहना चाहिए। तब एक साल में एक फिल्म करता था शायद मुश्किल से दो हो पाती थी।
अपने मन मुताबिक मंजिल तक पहुंचने के लिए आपको कई बार त्याग करने होंगे। मेरे केस में सब्र ही मेरे लिए सबकुछ रहा। चाहे दिल्ली में मैं थिएटर कर रहा था। उसके बाद मैंने मुंबई में बहुत समय तक टेलीविजन सीरीज नहीं किया था। मैं कहता था कि फिल्मों में काम करना आया हूं तो फिल्मों में ही करूंगा। भुखमरी की स्थिति बन गई। पैसा ही नहीं था इतना। जब अच्छा काम किया तो आगे भी मिला। मेरी सारी जद्दोजहद हमेशा से अच्छे काम की रही। मैं बहुत आभारी हूं कि आज भी इतने सालों बाद भी मैं काम कर रहा हूं, वो भी अपनी पसंद का।


Q.  आपकी कहानी पर 'थ्री इडियट्स' की एक लाइन सटीक बैठती है कि पैसे के पीछे मत भागो, एक्सीलेंस के पीछे भागो.. तो वो अपने आप आएगा। इससे आप कितना सहमत हैं?
मुझे यह कहना बुरा लगता है लेकिन मैं निजी तौर पर महसूस करता हूं कि जब आपके पास काम नहीं होता तो आपके पास बहुत काम होता है। यही वो समय है, जब आपको खुद पर काम करना होता है। 'पिंजर' और दो नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद अचानक से मेरे पास काम नहीं था। लोग मुझे काम नहीं दे रहे थे क्योंकि मेरी फिल्म चली नहीं थी। हमारे फिल्म जगत में जब फिल्म चलती है तो काम मिलता है। मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं था। मैं जीवन में सबसे ज्यादा अनुशासित तभी हुआ हूं। मैं 4.30 बजे सुबह उठता हूं और अपने रूटीन काम करता हूं। फिर मैं अपने ऊपर काम करता हूं।

 

Q. कभी असल जिंदगी में लिखने और निर्देशन के बारे में सोचा है?  
मैं कहानी अच्छी लिखता हूं। मैंने थिएटर में तीन पटकथाएं लिखी थीं। तो लेखन मैंने किया हुआ है। मेरे हिसाब से हर अभिनेता में लेखक होना चाहिए। उससे आपका प्रदर्शन अच्छा होता है। आप पटकथा की लाइन अच्छे से समझ सकते हैं। 'मिडिल ऑफ द रोड' फिल्में मुझे बहुत पसंद हैं। ये आपका मनोरंजन करने के साथ आपको व्यस्त भी रखती हैं।  

 


प्राची देसाई

Q.  'रॉक ऑन' से लेकर अब तक कई चीजें बदल चुकी हैं। ऐसे में आपके काम करने के तरीके में कितना बदलाव आया है?
मेरी पहली फिल्म के समय मेरी उम्र 19 साल थी, तो जाहिर-सी बात है कि इस उम्र में आपका अनुभव काफी कम होता है। 'कसम से' करते हुए मुझे काफी फिल्मों की पेशकश आईं। लेकिन जब ‘रॉकऑन’ आई तो अभिषेक कपूर ने पहली बार मुझे फोन किया। मुझे लगा कि कोई मेरे साथ मजाक कर रहा है और मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद उन्होंने 'कसम से' के क्रिएटिव डायरेक्टर से बात की कि आप बात कीजिए उनसे वो हमें  गंभीरता से नहीं ले रही हैं। वो मेरा और फरहान अख्तर का लुक टेस्ट करना चाहते थे कि हम साथ में आदित्य और साक्षी लग रहे हैं या नहीं। सबकुछ हुआ, इतना बेहतरीन हुआ, जितना मैंने सोचा भी नहीं था।

Q.  आपकी दमकती त्वचा का क्या राज है?
मैं अपनी त्वचा के लिए ज्यादा कुछ नहीं करती। बस, वही अपना साधारण-सा रोज का रुटीन फॉलो करती हूं। योग और ध्यान करती हूं। खूब पानी पीती और पौष्टिक खाना खाती हूं। इसके साथ ही मैं शहद, हल्दी इन सारी चीजें के फेस मास्क यूज करती हूं। मेरी कोशिश रहती है कि कम से कम मेकअप इस्तेमाल करूं। कभी बिना सनस्क्रीन लगाए बाहर नहीं जाती।

 

निर्देशक अबान भरूचा देवहंस


Q. ए.सी.पी. अविनाश वर्मा की ऐसी क्या विशेषताएं हैं, जो आपको मनोज बाजपेयी में नजर आती हैं?
उनकी जो आम विशेषताएं हैं कि वो अपने काम पर बहुत केंद्रित हैं। जब वो हाथ में कोई काम लेते हैं, तो उसके पूरा होने की जिम्मेदारी भी लेते हैं। वो अपने काम के प्रति ईमानदार हैं और ए.सी.पी. अविनाश वर्मा भी ऐसा ही इंसान है। उसके अंदर अपने काम के प्रति एक जुनून है।


 
Q.  डार्क स्टोरी में आज का समाज ज्यादा रुचि लेता है, इस बारे में आपका क्या मानना है?
आम जनता जब अपराध की कहानी देखती है, तो उसे लगता है हम तो सुरक्षित हैं। ये हमारी दुनिया नहीं है, ये एक रोमांचक दुनिया है। वो खुद इसका हिस्सा बनना नहीं चाहते लेकिन उसके बारे में सब-कुछ जानना जरूर चाहते हैं। ये उनके दिमाग के लिए एक तरह की कसरत है। तो जब आप मर्डर मिस्ट्री देखते हैं, तो आपका दिमाग इंगेजिंग होता है। इसलिए अपराध ज्यादा दिलचस्प होता है। आप इसमें हिस्सा लेते हैं और अपने दिमाग में हत्या या दूसरी चीजों की गुत्थी सुलझाते हैं। तो आप सब चीजों में शामिल होते हैं लेकिन आप घर पर पूरी तरह सुरक्षित हैं।

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