भाजपा की खराब रणनीति से कांग्रेस ने जीता तेलंगाना, के.सी.आर की योजनाओं की खुली पोल

Edited By Mahima,Updated: 04 Dec, 2023 11:59 AM

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राहुल की रैलियों, पार्टी की एकजुटता और भाजपा की खराब रणनीति से कांग्रेस ने जीता तेलंगाना रविवार को आए चार विधानसभा के नतीजों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस औंधे मुंह गिरी, लेकिन तेलंगाना में कांग्रेस ने बंपर जीत हासिल की।

नेशनल डेस्क: राहुल की रैलियों, पार्टी की एकजुटता और भाजपा की खराब रणनीति से कांग्रेस ने जीता तेलंगाना रविवार को आए चार विधानसभा के नतीजों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस औंधे मुंह गिरी, लेकिन तेलंगाना में कांग्रेस ने बंपर जीत हासिल की। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस की अपनी सरकार थी, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस सत्ता नहीं बचा पाई, जबकि तेलंगाना में कांग्रेस ने पूरी प्लानिंग के साथ चुनाव लड़ा और कांग्रेस की रणनीति व भाजपा की गलतियों से कांग्रेस तेलंगाना में दोबारा सत्ता में आ गई।

तेलंगाना की धारणा बदलने की शुरुआत मई में कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के साथ हो गई थी। उससे पहले कांग्रेस तेलंगाना में कहीं नहीं दिखती थी। उससे ज्यादा भाजपा दिखती थी। यहां तक कि चंद्रशेखर राव की सरकार में नंबर दो रहे एटाला राजेंद्र भी पार्टी छोड़ कर भाजपा के साथ गए और मुनुगोडे के उपचुनाव में भाजपा की टिकट पर जीत हासिल की। भाजपा ने अपने प्रचार तंत्र के दम पर बीआरएस और के चंद्रशेखर राव के परिवार को पूरी तरह से बदनाम कर दिया था। पार्टी में फूट डाल दी थी। परंतु उसके पास इसका लाभ लेने का तंत्र नहीं था।

तभी कर्नाटक की जीत के बाद नए जोश में कांग्रेस उत्तरी और बीआरएस विरोधी वोट को एक मजबूत खूंटा मिल गया। कर्नाटक के चुनाव से यह धारणा बनी कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस की ओर लौट रहा है। तेलंगाना में कांग्रेस को इसका फायदा मिला।

इंदिरा गांधी के नाम पर खेला इमोशनल कार्ड
इन चुनावों में पार्टी ने दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर इमोशनल कार्ड भी खेला और लोगों को यह बताया कि मेडक लोकसभा सीट से 1980 के चुनाव में वह जीत चुकी हैं और तेलंगाना कांग्रेस का अपना घर है। कांग्रेस की सरकार में ही तेलंगाना को अलग राज्य बनाया गया था लेकिन इसके बाद पार्टी का वहां से सफाया हो गया था। पार्टी का यह इमोशनल कार्ड भी काम कर गया और पार्टी चुनाव जीतने में कामयाब रही। 

कर्नाटक में जीत के बाद लौटा कांग्रेस का आत्मविश्वास
पिछले साल तक कांग्रेस के तेलंगाना में जीतने के कोई आसार नहीं थे, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी बी. आर. एस. अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थी और भाजपा का इस राज्य में कोई खास आधार नहीं है। लेकिन इस साल कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी को मिली जीत से कांग्रेस के हौसले बुलंद हुए और कांग्रेस ने पूरी ताकत के साथ तेलंगाना में चुनाव लड़ा।

टिकट वितरण को लेकर नहीं हुई बगावत
इन विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में टिकट वितरण को लेकर कांग्रेस ने बड़ी गलतियां कीं, लेकिन ऐसी गलतियां तेलंगाना में नहीं हुई क्योंकि कांग्रेस के नेताओं को सत्ता में आने की उम्मीद नहीं थी। लिहाजा इस राज्य में टिकट वितरण को लेकर पार्टी के भीतर कोई बड़ा बवाल नहीं हुआ, जिसके कारण किसी तरह की बगावत से पार्टी बच गई।

राहुल गांधी की रैलियों का असर नजर आया
राहुल गांधी द्वारा निकाली गई भारत जोड़ो यात्रा के दौरान तेलंगाना में बहुत उत्साह देखने को मिला था और पार्टी जमीनी स्तर पर इस उत्साह को भांप गई। पार्टी का राज्य में अच्छा खासा कैडर है और इस कैडर को चुनाव के लिए एक्टिवेट किया गया। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के अलावा स्टेट लीडरशिप द्वारा निकाली गई विजय भूमि यात्रा में भी राहुल गांधी ने भाग लिया। इससे भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और जनता में अच्छा संदेश गया।

पूरी पार्टी तेलंगाना में सक्रिय रही
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पूरे चुनाव के दौरान तेलंगाना में सक्रिय रहे और पल पल की फीडबैक लेते रहे। कर्नाटक में जीत के बाद पार्टी ने कर्नाटक के अपने सारे शीर्ष लीडर तेलंगाना में डयूटी पर लगा दिए। पार्टी ने। एक सधी हुई रणनीति के तहत हर रसीट र पर आब्जर्वर बिठाए और सीटों का पूरी तरह माइक्रो मैनेजमेंट किया। इससे भी पार्टी को जीत हासिल करने में मदद मिली।

के.सी.आर. की योजनाओं की खोली पोल
अपने चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस राज्य की जनता को यह बताने में कामयाब रही कि सत्ताधारी बी. आर. एस. द्वारा चलाई जा रही लोक कल्याण की योजनाओं में आम जनता के लिए कटौती की गई है। तेलंगाना में लड़की की शादी के लिए कल्याण लक्ष्मी योजना के तहत राज्य सरकार 1 लाख रुपए दे रही थी, संयुक्त आंध्र प्रदेश में यह रकम 2.61 लाख रुपए थी, इसके अलावा बुढ़ापा पैशन में एक परिवार में एक ही पैशन दी जा रही थी, जबकि संयुक्त आंध्र प्रदेश में परिवार के दोनों बुजुर्ग सदस्यों को पैंशन दी जा रही थी। तेलंगाना में गरीबों को राशन के नाम पर सिर्फ चावल दिए जा रहे थे और संयुक्त आंध्र प्रदेश में चावल के साथ-साथ 9 अन्य जरूरत की वस्तुएं भी दी जा रही थीं।

भाजपा की खराब रणनीति का मिला फायदा
कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की खराब रणनीति का भी कांग्रेस को फायदा हुआ। पिछले साल तक बी. आर. एस. के मुकाबले कांग्रेस की बजाय भाजपा टक्कर में नजर आ रही थी, लेकिन भाजपा को लगा कि उसकी इस रणनीति से बी. आर. एस. को नुकसान होगा और कांग्रेस सत्ता में आ सकती है। लिहाजा भाजपा ने अपनी मुहिम धीमी कर दी और इस बीच कांग्रेस कर्नाटक का चुनाव जीत गई। भाजपा तेलंगाना में बी. आर.एस. की जीत को लेकर आश्वस्त थी। इसके अलावा उसके पास राज्य में पार्टी काडर नहीं था। लिहाजा उसने ज्यादा जोर नहीं लगाया लेकिन अंत में जब भाजपा को लगा कि बी. आर. एस. मुकाबले से बाहर हो रही है तो पार्टी ने तेलंगाना में जोर लगाना शुरू किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भाजपा की इस खराब रणनीति का भी कांग्रेस को फायदा हुआ और तेलंगाना में भाजपा सत्ता में नहीं आ सकी। पार्टी ने चुनाव से 6 महीने पहले अपने स्टेट प्रेजीडेंट बांदी संजय कुमार को प्रदेशाध्यक्ष पद से हटा दिया। इसका भी पार्टी को नुकसान हुआ।

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