कृष्णावतार

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Wednesday, August 21, 2013-9:16 AM

देवकी रानी छज्जे से उतर कर नीचे बरामदे में आ गईं। उनकी दृष्टि उस स्थान पर ही जमी हुई थी जहां उनका पुत्र इस समय खड़ा था। जब चानरुड़ ने श्री कृष्ण को मल्ल युद्ध के लिए ललकारा था तो उनके हृदय की गति जैसे रुक गई थी। विवाह के समय से अर्थात 25 वर्षों से वह निरन्तर दु:ख झेल रही थीं और उनका समस्त जीवन इस काल में एक भयानक और दु:खद सपना ही बना रहा था।

जब कभी भी उन्हें यह ध्यान आता कि उनके पुत्रों की कैसे क्रूरतापूर्वक हत्या की गई थी तो उनका हृदय कांप उठता था। जो दो पुत्र उनके जीवित बचे थे वे एक अनजानी छत की छाया में पल कर बड़े हो रहे थे और उनके ताया का पुत्र क्रोध से लाल-पीला होकर उन दोनों के भी प्राण लेने पर उतारू था।

केवल यह आशा अपने हृदय में संजोए वह अब तक जीवित रहीं कि उनका आठवां पुत्र उन्हें और समस्त यादवों को कंस के भयंकर अत्याचारों से छुटकारा दिलाएगा। वह दम साधे आज के दिन की प्रतीक्षा कर रही थीं। कभी एक पल के लिए वह उसे भूल नहीं पाई थीं।

केवल एक ही बात उनका धीरज बंधाती रही थी कि अपने नीलमणि के समान पुत्र की नीलम की नन्ही सी मूर्ति जिसे वह सदा सोने के हिंडोले में झुलाया करती थीं उसी से उन्हें ऐसा अनुभव होता रहता था कि अब उनका नन्हा-मुन्ना कृष्ण बातें कर रहा है... अब मुस्करा रहा है... अब बालक जैसी चंचलता कर रहा है और अब अपनी नन्हीं-नन्हीं बांहें उनके गले में डाल रहा है... अब रूठ कर उनके पास से दूर जा बैठा है और फिर मनाने के लिए दौड़ता चला आता है... और फिर उनसे लिपट कर अपनी बाहें उनके गले में डाल देता है और फिर अपना गाल उनके गाल से स्पर्श करता है, अब गोद में लेट जाता है।   

                                                                                                                                                              (क्रमश:)


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