ऐसे पाइए रिद्धि सिद्धि के दाता गणपति का आशीर्वाद ...

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Wednesday, January 15, 2014-7:37 AM

भगवान गणेश का स्वरूप अत्यन्त ही मनोहर एवं मंगलदायक है। वे एकदन्त और चतुर्बाह हैं। अपने चारों हाथों में वे क्रमश पाश, अंकुश, मोदक पात्र तथा वर मुद्रा धारण करते हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीत वस्त्र धारी हैं। वे रक्त चंदन धारण करते हैं तथा उन्हें रक्त वर्ण के पुष्प विशेष प्रिय हैं। वे अपने उपासकों पर शीघ्र प्रसन्न होकर उनकी समम्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

एक रूप में भगवान श्री गणेश उमा महेश्वर के पुत्र हैं। वे अग्रपूज्य, गणों के ईश, स्वस्तिकरूप तथा प्रणव स्वरूप हैं। अनके अन्नत नामों में सुमुख, एकदन्त , कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विध्ननाशक, विनायक, धूमककेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र तथा गजानन ये बारह नाम अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। इन नामों का पाठ अथवा श्रवण करने से विद्यारम्भ, विवाह, गृह नगरों में प्रवेश तथा गृह नगर से यात्रा में कोई विध्न नहीं होता है।

भगवान गणपति के अनेक अवतार हुए हैं। उनके सभी चरित्र अनन्त हैं। पदम पुराण के अनुसार एक बार पार्वती जी ने अपने शरीर के मैल से एक पुरूषाकृति बनाई जिसका मुख हाथी के समान था। फिर उस आकृति को उन्होंने गंगा जल में डाल दिया। गंगा जल में पड़ते ही वह आकृति विशालकाय हो गई। पार्वती जी ने उसे पुत्र कहकर पुकारा देव समुदाय ने उन्हें गंगये कहकर सम्मान दिया और ब्रहमाजी ने उन्हें गणों का अधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया।

लिंग पुराण के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवान शिव की उपासना करके उनसे सुरद्रोही दानवों के दुष्कर्म में विध्न उपस्थित करने के लिए वर मांगा। आशुतोष शिव ने तथास्तु कहकर देवताओं को संतुष्ट कर दिया। समय आने पर गणेश जी का प्राकट्य हुआ। उनका मुख हाथी के समान था और उनके एक हाथ में त्रिशुल तथा दूसरे में पाश था। देवताओं ने सुमन वृष्टि करते हुए गजानन के चरणों में बारम्बार प्रणाम किया। भगवान शिव जी ने गणेश जी को दैत्यों के कार्यों में विध्न उपस्थित करके देवताओं और ब्रह्माणों का उपकार करने का आदेश दिया।

प्रजापति विश्वकर्मा की सिद्धि बुद्धि नामक दो कन्याएं गणेश जी की पत्नियां हैं। सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नामक शोभा सम्पन्न दो पुत्र हुए। शास्त्रों और पुराणों में सिंह मयूर और मूषक को गणेश जी का वाहन बताया गया है।

गणेश पुराण के क्रिड़ा खण्ड में उल्लेख है कि कृतयुग में गणेश जी का वाहन सिंह है। वे दस भुजाओं वाले, तेज स्वरूप तथा सब को वर देने वाले हैं और उनका नाम विनायक है। त्रेता में उनका वाहन मयूर है, वर्ण श्वेत है तथा तीनों लोकों में वे मयूरेश्वर नाम से विख्यात हैं और छ भुजाओं वाले हैं।

द्वापर में उनका वर्ण लाल है। वे चार भुजाओं वाले और मूषक वाहन वाले हैं तथा गजानन नाम से प्रसिद्ध हैं। कलयुग में उनका धूम्रवर्ण  है। वे घोड़े पर आरूड़ रहते हैं। उनके दो हाथ हैं तथा उनका नाम धूम्रकेतू है। मोदक प्रिय गणेश जी विद्या बुद्धि और समस्त सिद्धियों के दाता तथा थोड़ी उपासना से प्रसन्न हो जाते हैं।

उनके जप का मंत्र ओम गं गणपतेय नम: है।    

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